-किसान को लागत पर ५० प्रतिशत मुनाफा; वादे से एमएसपी के फार्मूले तक कितना फासला?
अनल अज्ञात
भाग-४
२०१४ के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के कृषि एजेंडे का सबसे चर्चित वादा था किसानों को उनकी लागत पर कम से कम ५० प्रतिशत लाभ दिलाना। यह कोई बाद में जोड़ा गया राजनीतिक दावा नहीं है। भाजपा के घोषणापत्र में कृषि को लाभकारी बनाने और लागत के ऊपर ५० प्रतिशत लाभ सुनिश्चित करने की बात बाकायदा दर्ज थी।
सरकार ने २०१८-१९ के बजट में घोषणा की कि अधिसूचित फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत का कम से कम डेढ़ गुना रखा जाएगा। इसके बाद केंद्र ने कहा कि सभी अधिसूचित खरीफ, रबी और अन्य व्यावसायिक फसलों के एमएसपी में लागत पर न्यूनतम ५० प्रतिशत रिटर्न सुनिश्चित किया गया है। अगस्त २०२६ तक सरकार इसी नीति को जारी रखने की बात कह रही है। तो क्या २०१४ का वादा पूरा मान लिया जाए? यहीं से असली बहस शुरू होती है।
सरकार एमएसपी की गणना के लिए मुख्य रूप से A2+FL लागत को आधार बनाती है। इसमें किसान द्वारा किया गया नकद खर्च और परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है। किसान संगठनों का एक हिस्सा लंबे समय से मांग करता रहा है कि स्वामीनाथन आयोग की व्यापक C2 लागत, जिसमें अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल है, के ऊपर ५० प्रतिशत जोड़कर एमएसपी तय किया जाए। स्वयं सरकार संसद में स्पष्ट कर चुकी है कि एमएसपी C2 को संदर्भ लागत के रूप में देखता है, लेकिन ५० प्रतिशत रिटर्न की गणना A2+FL के आधार पर होती है। यानी ‘लागत + ५० प्रतिशत’ के दो अलग अर्थ राजनीतिक विवाद के केंद्र में हैं।
दूसरा सवाल यह है कि एमएसपी घोषित होना और किसान को एमएसपी मिलना एक ही बात नहीं है। सरकार २२ फसलों के लिए एमएसपी तय करती है, लेकिन सभी फसलों की पूरी उपज सरकारी एजेंसियां नहीं खरीदतीं। सरकार ने अगस्त २०२६ के संसदीय उत्तर में स्वयं कहा कि कुल उत्पादन में से केवल marketable surplus उपलब्ध होता है और सरकारी खरीद तब की जाती है जब परिस्थितियां तथा खरीद व्यवस्था लागू होती है।
२०१४ में सिंचाई पर ‘हर खेत को पानी’, कृषि बीमा, साइल हेल्थ, राष्ट्रीय कृषि बाजार, किसान बाजार और खाद्य प्रसंस्करण को भी प्राथमिकता देने का वादा किया गया था। बाद में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, साइल हेल्थ कार्ड और e-NAM जैसी योजनाएं शुरू हुर्इं। लेकिन सभी केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने से ज्यादा कुछ नहीं साबित हुर्इं। इनका नाममात्र लाभ भी किसानों को नहीं मिल सका। किसान के लिए अंतिम पैमाना योजना का नाम नहीं, उसकी जेब है। यदि किसी किसान की फसल की घोषित एमएसपी लागत से डेढ़ गुना है, लेकिन उसे बाजार में उससे कम कीमत मिलती है, तो सरकारी फार्मूले की उपलब्धि उसके लिए निरर्थक है।
इसी तरह सिंचाई, बीमा और डिजिटल मंडी का विस्तार तभी सार्थक है जब खेती की शुद्ध आय स्थिर हो। यहां एक तथ्य और जरूरी है, ‘२०२२ तक किसान की आय दोगुनी’ वाला जुमला भाजपा ने बाद में २०१६ में फेंका। जबकि २०१४ का वास्तविक हिसाब लागत पर ५० प्रतिशत लाभ, सिंचाई, बीमा और कृषि बाजार सुधार के आधार पर करने का काम पहले ही अधर में लटका था।
लिहाजा आज बारह साल बाद किसानों का सरकार से सीधा सवाल यही है, एमएसपी का सरकारी गणित खेत की वास्तविक अर्थव्यवस्था से कितना मेल खाता है?
