-विश्वास की जगह संदेह ने ली, तो प्यार का रिश्ता भी बन जाता है मौत का फंदा
फिरोज खान
शादी को सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है, लेकिन जब इस रिश्ते में विश्वास की जगह शक घर कर जाता है, तो हंसता-खेलता परिवार भी तबाही के कगार पर पहुंच जाता है। सवाल यह है कि आखिर पति के मन में शक का शैतान जागता है, तो उसकी उंगली सबसे पहले पत्नी के चरित्र पर ही क्यों उठती है? और कई मामलों में यही शक पत्नी की हत्या की वजह बन जाता है। शालिनी और दिलीप कुमार की कहानी इसी खतरनाक मानसिकता की ओर इशारा करती है। दोनों शिक्षक थे और उनकी शादी को नौ साल हो चुके थे। उनका एक बच्चा भी था। शालिनी नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारियां निभाती थी, लेकिन पति उसकी व्यस्तता और फोन पर बातचीत को संदेह की नजर से देखने लगा। फोन बिजी मिलना और काम में व्यस्त रहना, उसके शक को बढ़ाने लगा। आखिरकार, रिश्ते में पनपते संदेह ने गंभीर रूप ले लिया।
आखिर पत्नी ही निशाने पर क्यों?
समाज में आज भी महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे पति, परिवार और बच्चों की हर जिम्मेदारी निभाएं। इसके बावजूद उनकी नौकरी, मोबाइल फोन, दोस्तों और आने-जाने पर सवाल खड़े किए जाते हैं। कई पुरुष पत्नी को बराबरी का साथी मानने के बजाय अपनी संपत्ति समझने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि शादी का मतलब किसी की आजादी पर पहरा लगाना नहीं है।
हर शक हत्या में नहीं बदलता, लेकिन जब संदेह के साथ गुस्सा, अधिकार जताने की प्रवृत्ति और हिंसा जुड़ जाती है, तो परिणाम जानलेवा हो सकते हैं। पत्नी के चरित्र पर आरोप लगाना किसी अपराध का प्रमाण नहीं है और न ही किसी को सजा देने का अधिकार देता है।
बचाव का रास्ता क्या है?
पति-पत्नी के बीच संवाद, पारदर्शिता और आपसी सम्मान जरूरी है। शक बढ़ने पर बातचीत या काउंसलिंग की मदद लेनी चाहिए। धमकी, मारपीट, जबरन निगरानी या जान से मारने की बात को मामूली घरेलू झगड़ा समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खतरा महसूस होने पर भरोसेमंद परिजनों, पुलिस या महिला सहायता सेवाओं से संपर्क करना चाहिए।
याद रखिए शक रिश्ते को तोड़ सकता है, लेकिन किसी की जान लेने का अधिकार नहीं देता। पत्नी जीवनसाथी है, शक मिटाने के नाम पर निशाना बनाने वाली कोई वस्तु नहीं।
