मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य: आमरण-अनशन

अवधी व्यंग्य: आमरण-अनशन

एड. राजीव मिश्र / मुंबई

सोहन अउर संगीता के बियाह भये लगभग दस बरिस होइ गवा, दूनउ के जिनगी हंसी-खुशी अउर पियार मोहब्बत में बीति बीति गऽ पर पिछले कुछ महीना से सोहन संगीता से छोटि-छोटि बात पे गुस्सा होइ जात थें। सुबह चाय में लेट भवा तो मुंह फूलि के पनडब्बा होइ जातथऽ। खाना में रच्चउ देरी भय तो मानो पूरा घर मूड़े पर उठाय लेत हैं। वइसे तो संगीता सोहन के खाना-पीना के पूरा धियान रक्खत हैं फिर भी घर है, लड़िका छेहर हैं तो कउनउ मिलिट्री के नियम तो है नही कि एक्कउ मिनट देर न चली, पर सोहन हैं कि जब देखो गउखा नियर थुम्बा लटकाए ही रहत हैं। एहर बिचन जब से कचहरी जाए लगें हैं, थोड़ा बहुत नेतागीरी में लगे हैं तो एक नई आदत सीखि गएं हैं। कउनउ बात पे संगीता से रिसियइहैं तो खाना-पीना छोड़ि के दुआरे नीम के पेड़ के नीचे खटिया लगाय के बइठ जात थें। जब से सोहन के बाबू-माई अउर संगीता के सास-ससुर चार धाम के यात्रा पे गएं हैं तब से सोहन घर मा चरस बोई दिये हैं। जब देखो बात-बात पर भूख हड़ताल कइ देत हैं। अब कालय, संगीता के लड़िकन के तैयार करय के चक्कर में खरमेटाव बनवइ में थोड़ा देर का भवा, सोहन पूरा घर मूड़े पे उठाय लिहे। सुबह के चाय के बाद खरमेटाव अउर खाना दूनउ मना कइ दिहें और जाय के नीम के नीचे बइठ गएं। संगीता लाख मनाई पर यहि बार सोहन के गुस्सा सातवें आसमान पे रहा। जब संगीता के ज्यादा मान-मनउवल शुरू किहिन तो अचानक सोहन खटिया पर से उठे अउर घर के सब सामान एक-एक कइके तोरय लगे। तब तक सोहन के बाबू महंत चार धाम से आइ गएं। संगीता से सब बात सुनय के बाद, रोरियहवा बांस के लाठी उठाये अउर बोले, का रे सोहना! ई घर है कि जंतर-मंतर? जब देखो तब ससुरा नेतन की नाय आइके ओलरि जात हैं कहिके सोहन दुइ लाठी मारेन, दुइयै लाठी परत सोहन एक दुइ तीन होइ गए अउर आज तक फिरि से आमरण अनशन पे नही बइठे।

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