एड. राजीव मिश्र मुंबई
सुबह-सुबह फूलदेई अपने दुआरे बैठीं घाम लेत रहीं तब से कउनउ ओर से मिठना दाई आई धमकी। सुनत हऊ हो फूलदेई! का भा अइया? हियाँ आओ…आज दुइ दिन से सिफला के घर में जवन महाभारत मची है कि पूछो मत। ठीक है अइया जाए देव, कहिके मिठना के कानाफूसी कौशल पर हथौड़ा मारि दिहिन। अरे, वैâइसे जाए देई? शांति तो हमरे घर के चली गई है। तुम्है तो कउनउ फरक पड़त नही है। तुमही तो कह्यौ अइया कि पुछो मत तो अब काहें चौड़ियाय रही हो। अइसा है फूलदेई हमका लागत है अब सिफला के घर में अलगौझी होइ के रही। उनकर बड़की पतोह सुभाव के बड़ी नीक है पर छोटकी जब से आई है अपने मनसेधू के अपने मुट्ठी में कइके घर में अन्होर कइ दिहिस। पहिले बड़की अपने सास-ससुर के सेवा करत रही पर छोटकी के देखा-देखी उहौ छोड़ि दिहिस। अइसन है दाई, अब तो घर-घर के ई हाल होइ गवा है, इहमा कउनउ बड़ी बात नही है। अरे, वैâइसे बड़ी बात नही है, आखिर अदमी लड़िका कउने दिन बिना पैदा करत है? बूढ़-पुरनिया, माई-बाप यहि उमिर मा खुद से ठोकत-पकावत हैं। तब तक सिफला के घर से जोर-जोर से चिल्लाए के आवाज आवै लागि। अइसा है फूलदेई रुको, लागति है फिर से सिफला के घर मा कचौधन शुरू होइ गवा है। हम खबर निकारित है, कहिके मिठना सिफला के घर की ओर चलि दिहिन। पहुँचतय मिठना सिफला की तरफ बढ़ी अउर बोली का होइ गवा बहिनी, काहें कचौधन मची है घर मा? देखो जवन कुछ होय आपस मे बैठि के सुलझाय लेव। अब भगवान जब अलग-अलग पैदा कीन्ह हैं तो अलगाये में कउनउ बुराई नही है। बड़कू आपन नहाय-खाय, छोटकू आपन। रहि गवा तुम दूनउ परानी के तो तुम बुढ़ाई थोरिउ गई हौ, तुम्हउ आपन बनओ खाओ। अइसा है मिठना, तुम आपन घर, आपन लड़िका देखो। चार-चार लड़िका होत अपने हाथ से ठोकत खात हऊ। हमरी इहाँ यहि बात पे झगड़ा होइ रही है कि माई-बाप के दूनउ लड़िका अपने साथ रखे बदे एक-दूसरे से रार कइ रहें हैं। चलो अब निकरो घर की ओर, इतना सुनते मिठना मुँह गिराए अपने घर की ओर निकरि गईं।
