डाॅ. रवीन्द्र कुमार
पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं कि मीडिया में फुल-फुल बावेला मचा हुआ है कि पेपर लीक हो गया-पेपर लीक हो गया। कहीं-कहीं तो किसी ने पूरी लिस्ट ही बना दी है कि कब-कब कौन सा पेपर लीक हुआ। कितने लाख अभ्यर्थियों का नुकसान हुआ वगैरा-वगैरा। आपने वो कहावत नहीं सुनी कि हर काम में कुछ न कुछ फायदा (पाॅजिटिव) भी होता है। आप लोगों की नजर उस पर जाती ही नहीं। आंखों को ‘निगेटिव’ देखने की बुरी आदत हो गई है। आप को चांद का उजला पक्ष दिखता ही नहीं या फिर दिखता भी है तो आप उसे स्वीकार नहीं करते। पर्चा बनाना अर्थात प्रश्नपत्र सेट करना कोई आसान काम नहीं है। आग का दरिया है और डूब के जाना है। आप सोचो अगर पेपर सेट करना आग का दरिया है तो उसे लीक करना किसी ज्वालामुखी से कम नहीं। लेकिन वो कहते हैं न खतरों के खिलाड़ी ही जंग में फतह पाते हैं।
यह बहुत क्लिष्ट प्राॅसिजर है। देखिए जो पेपर सेट कर रहा है या तो आप उसे सेट करो। उसका तोड़ गवर्नमेंट ने ये निकाला कि कई पेपर सेटर चुन कर उन से 10-10, 20-20 सवाल सेट करा लेते हैं। फिर सबको मिक्स करके जितने सवाल चाहिए ले लेते हैं। इसमें एक परेशानी यह है की अब कई सारे पेपर सेटर को सेट करना आसान काम नहीं। उनमें कोई न कोई ऐसा सिरफिरा निकल आता है, जो अड़ जाता है। इस एक ईमानदार की वजह से पूरा प्रोजेक्ट खतरे में आ जाता है। अतः बेहतर विकल्प ये है कि फोटोस्टेट वाले को या फिर पूरी श्रृंखला में किसी न किसी को तोड़ना पड़ता है, जैसे प्यून, दफ्तरी या बाबू को। कई बार लालची अथवा तुरंत अमीर बनने की चाह रखने वाला या फिर रिटायर होने वाले अफसर भी सहयोग करते हैं। इसमें बंदे को हिंदी फिल्म की लड़की के बाप की तरह कहना पड़ता है, “इस चेक में जो रकम चाहो भर लो और पेपर की एक कॉपी यहाँ रख कर देश छोड़ कर चले जाओ” या फिर “इस सूटकेस में इतनी रकम है कि तुम्हारी सात पीढ़ी को काफी होगी” यह करोड़ों का खेल है। फिर इस पेपर की मार्केटिंग करनी पड़ती है। बहुत से लोग इसे इनवेस्टमेंट की तरह लेते हैं। दोनों, पेपर बेचने वाला भी और पेपर खरीदने वाला भी।
देखिए अगर पेपर लीक नहीं होता तो आप पास कैसे हो पाते? और जैसे-तैसे पास हो भी जाते तो फिर जानलेवा पढ़ाई और फीस। इनसे बच पाना मुश्किल है। ‘लोन’ लेने में और फिर उसे चुकाने में न जाने कितने जोड़ी जूते-चप्पल घिस जाते। एक बार पेपर लीक हो जाता है, फिर आप भी विकल्प ढूंढने में लग जाते हो। बड़े-बड़े आविष्कार ‘क्राइसिस’ में ही हुए हैं। आप बड़े लोगों की आत्मकथा पढ़ोगे तो ऐसी सैकड़ों कहानियों से भरी पड़ी हैं, कैसे उनके मां-बाप उन्हें कुछ बनाना चाहते था, मगर वो बन कुछ और गए। वे कैसे बहुत सफल रहे। आपने वो सुना नहीं जो मन का हो जाये तो अच्छा न हो तो और भी अच्छा। क्योंकि यह नियति द्वारा आपको परोसा गया है, उसकी इज्ज़त करें। पेपर लीक बहुत अच्छी चीज है। इससे न जाने कितनों की जिंदगी संवर जाती है। अतः इस पेपर लीक को दिल पर न लें। हमारे देश में डॉ. का क्या काम?, इंजीनियर का क्या काम? हम तो वैसे ही विश्वगुरु हैं। पेपर लीक कर-कर के हम तीसरे या चौथे नंबर पर तो आ ही गए हैं। अब क्या पेपर लीक नहीं कर के फिसड्डी बनना चाहते हैं? आप टेंशन क्यूं ले रहे हो? खुली डिग्री बिक रही हैं, एक पकड़ लीजिए सौदा खरा-खरा। प्रेक्टिस चालू कर दो बाकी जीना-मरना तो ईश्वर हाथ है। लीक हमारा राष्ट्रीय पर्व है। हमारी छतें लीक करती हैं, हमारी बड़ी से बड़ी इमारत लीक करती है। हमारे पुल लीक करते हैं। हमारे एयरपोर्ट लीक करते हैं। हमारी ट्रेन लीक करतीं हैं।
हमारे नल बंद होने के बावजूद लीक करते हैं। हमारी फ्लश की टंकी लीक करती है। बाॅल पेन आने से पहले हमारे फाउंटेन पेन भी लीक करते थे। हमारे दफ्तरों में तो न जाने क्या-क्या लीक होता है। बोले तो डिसीजन लीक हो जाता है। फाइल किसके पास है, ये बात लीक हो जाती है। पेपर कौन सेट कर रहा है, ये लीक हो जाता है। आजकल बॉस के कौन ज्यादा मुंह लगा हुआ है, ये लीक हो जाता है। यहां तक कि किसका चक्कर किसके संग है, ये बात पूरे दफ्तर में लीक हो जाती है। अतः लीक को इतना सीरियसली नहीं लेना है। वीर तुम बढ़े चलो !! लीक तो होता ही रहेगा। इसके लिए कोई ‘एम-सील’ नहीं चली है। इस लीक के साथ जीना जितना जल्दी हो सीख लेना चाहिए। जिंदगी एक ज़ंग है। मत भूलो कि आप वाॅरियर हैं, बोले तो योद्धा। सच तो यह है कि तुरंत प्रभाव से हमें जरूरत है एन.एल.ए. की। नहीं समझे? नेशनल लीक एजेंसी।
