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पुस्तक समीक्षा : कोंकणी मुसलमानों की सामाजिक जिंदगी का आईना : ‘समंदर बोलता है’

राजेश विक्रांत

इस पुस्तक के अनुवादक डॉ मुख्तार खान तलनीकर ने एकदम सही लिखा है कि, “समंदर बोलता है एक ऐसा उपन्यास है, जिस महाराष्ट्र के समुद्री साहिल पर आबाद कोंकणी मुसलमानों के सामाजिक जीवन को बड़ी खूबसूरती के साथ मंज़र-ए-आम पर लाया गया है। इस उपन्यास का महत्त्व इसलिए भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इस उपन्यास के द्वारा हम पहली बार कोंकणी ग्रामीण मुसलमानों के सामाजिक जीवन, उनकी संस्कृति और जीवन संघर्ष से सीधे रू-ब-रू होते हैं।”
पूरे महाराष्ट्र में कोंकण की बात ही निराली है। कुदरत ने इसे सब कुछ दिया है- अप्रतिम भौगोलिक संरचना व बेमिसाल सौंदर्य से लबरेज कोंकण के एक ओर समंदर है तो दूसरी ओर लंबे पहाड़। नारियल, कटहल, काजू और सुपारी के साथ विश्व प्रसिद्ध ‘हापुस आम’ के लिए मशहूर है यह इलाका। ‘समंदर बोलता है’ की शुरुआत यूं होती है-
“खामोश अंधेरी रात के सन्नाटे में ठाठें मारता हुआ समंदर शीर बरपा किए हुए था। नवंबर की खनक सर्द हवा अब उन्हें उठने पर मजबूर कर रही थी, अलाव में जलाए जाने वाले नारियल के सूखे परी और थान का सूखा घास अब खत्म हो चुका था, रात के हो बजने की थे। ग्यारह बजे सरफराज के घर उसके वालिद इया ‘खोत मरहूम’ (इब्राहिम मुकादम) के ईसाल-ए-सवाय (मुर्दे की रूह को कुरान पढ़ने या खाना खिलाने का सवाव पहुंचाने के लिए) की खातिर मदह-ख्वानी (प्रार्थना सभा) हुई। आज उनके इंतिकाल की एक महीने से कुछ ज्यादा का अर्सा बीत चुका था।”
वकार क़ादरी ने इसी इलाके के निवासी कोंकणी मुसलमानों की जीवन शैली, इबादत के स्थानीय तौर-तरीके शादी-ब्याह की रस्म व रिवाज, युवाओं का रोज़गार की तलाश में मुंबई औ देश-विदेश की यात्रा करना, विस्थापन से उपजी समस्याएं, इन सभी सामाजिक मुद्दों को उपन्यास में बड़ी खूबसूरती के साथ बुना गया है।
यूं तो यह उपन्यास सलीम और सलमा की प्रेम कहानी है। पर इस प्रेम कहानी के जरिए वकार कादरी ने एक शताब्दी के समय काल को समेटते हुए कोंकण के सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक पहलुओं को भी कथानक में शामिल किया है। 1947 का बंटवारा, आजादी, गोवा का मुक्ति संग्राम, 1975 की लड़ाई व मुंबई से जुड़ी घटनाएं हैं-
“कॉमरेड जब्बार मुम्बई की किसी कपड़ा मिल में काम करते थे। यूनियन से जुड़े होने के कारण कॉमरेड कहलाए जाने लगे। धीरे-धीरे गाँव के भी लोगों के लिए वह कॉमरेड जब्बार हो गए। मुंबई की कपड़ा मिलों के मालिक जब जॉर्ज फर्नाडिस और फिर दत्ता सामंत की ट्रेड यूनियनों से तंग आकर गुज़ात जाने लगे, तो मुम्बई की कपड़ा मिलें बंद होती चली गई। कॉमरेड भी मुंबई में उन दिनों बे-रोज़गार हो गए थे। मुंबई में अपनी तेली मोहल्ले की खोली ही में रहते, वहां डी-कंपनी का उरूज हो रहा था। वहां लगे रहे। माह-दो माह में गांव का चक्कर लगा आते।”
ऐसे माहौल में नायक और नायिका ‘सलीम’ और ‘सलमा’ की प्रेम कहानी जवान होती है। हालात के चलते सलमा की शरीफ से शादी हो जाती है, लेकिन अंत में सलमा और शरीफ मिलते हैं। दोनों का विवाह होता है। इस दौरान अफजल, सज्जाद, बूढ़ी दादी, बाबा जमालउद्दीन, गांव के नौजवान आशिकों की आदर्श मुंबईवाली, देसी शराब का ठेका चलाने वाली वरजेश्वरी और बात-बात में ‘धत्त तेरा पाकिस्तान’ कहने वाली देशभक्त खातून की उपस्थिति ‘समंदर बोलता है’ को जीवंत करती है।
उपन्यास में
‘बूढ़ी दादी’ का चरित्र बड़ा जीवंत है। लेखक और दादी के संवादों में गाँव की संस्कृति, समाज और इतिहास के दर्शन होते हैं। विभाजन की त्रासदी से लेकर ब्रिटिश काल की एतिहासिक घटनाओं को दादी ने रोचक किस्सों के माध्यम से अपनी स्मृति में संजोये रखा है। उपन्यास में गांवों के मसले हैं, अंधविश्वास हैं तो भाईचारे की खूबसूरती भी है। सलीम को पुल गांव के नागू अन्ना के यहां छुआछूत का अनुभव होता है तो मराठी हाईस्कूल में उसने इंसानियत का एक अलग रूप भी देखा था जहां पर दलित, ब्राह्मण और अन्य हिंदू बच्चे मिल बांटकर एक दूसरे के खाने के डिब्बे खाया करते थे।
वकार कादरी माहौल के वर्णन के साथ सूक्ष्म ऑब्जर्वेशन पर खास ध्यान देते हैं-
“स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस लोनेरे फाटे से राइट मारकर गोरेगाँव और फिर पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के गांव मांडवी, पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के गांव अंबेत से होती हुई मंडन गढ़ पहुंची।”
इस तरह के जीवंत विवरण का एक और उदाहरण देखिए-
“हरनई बंदरगाह पर मछेरे अपनी कश्तियों और स्टीमरों से मछलियों से भरे टोकरे उतार लाते हैं और उन्हें अपनी औरतों के हवाले कर देते हैं, जिन्हें बेचने की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी उन औरतों की होती है। नीलामी होती है। बोली लगती है। महँगी मछलियों में पॉपलेट, सुरमई घोल, छोटा झींगा, बड़ा झींगा, लॉबस्टर, हलवा। और सस्ती मछलियों में बोंबिल मांदले, च्योना, बांगड़े वगैरह। ज्यों ही टोकरे लाकर रखे जाते हैं, खरीदार हैसियत के मुताबिक बोली लगाते हैं। जो सबसे ज़्यादा बोली लगाए, गांठ से रुपया निकालकर अदा करे, मछली का टोकरा उसका। यह ‘पैसा फेंक तमाशा देख’ वाला मामला है।”
कुल मिलाकर समंदर बोलता है एक अद्भुत उपन्यास है। इसमें स्थानीय बोली भाषा के शब्दों व मुहावरों का खूबसूरत इस्तेमाल है, रीति रिवाज व परंपराएं हैं, सांप्रदायिक सौहार्द है। कादरी उर्दू साहित्यकार हैं। मूल रूप से उर्दू में लिखे गए इस उपन्यास का सुंदर अनुवाद करने वाले मुख्तार खान बधाई के पात्र हैं। लोकमित्र, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास की पृष्ठ संख्या 132 और मूल्य 295 रुपए है।

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