मुख्यपृष्ठनए समाचारबुलेट ट्रेन का ‘ब्रेकथ्रू’, मगर सच्चाई पर ब्रेक!

बुलेट ट्रेन का ‘ब्रेकथ्रू’, मगर सच्चाई पर ब्रेक!

– रेल मंत्रालय की मुंबई के पत्रकारों से ‘एलर्जी’

– पत्रकारों से दूरी, पारदर्शिता पर चोट

– बिना सवाल का कार्यक्रम, बिना जवाब की सरकार

जेदवी / मुंबई

पालघर जिले में मुंबई-अमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की पहली पर्वतीय सुरंग के ब्रेकथ्रू को केंद्रीय रेल मंत्रालय ने बड़ी तकनीकी उपलब्धि के रूप में पेश किया, लेकिन इस जश्न के बीच कई गंभीर सवालों को जानबूझकर दबा दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस अहम कार्यक्रम में मुंबई के पत्रकारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। स्थानीय पत्रकारों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगीr है कि न मुंबई के प्रमुख अखबारों और चैनलों को आमंत्रित किया गया, न ही किसी पत्रकार को सवाल पूछने का अवसर मिला।
चर्चा यहां तक है कि केंद्रीय रेल मंत्रालय और संबंधित मंत्री को मानो मुंबई के पत्रकारों से ही ‘एलर्जी’ हो गई हो। करीब १.५ किलोमीटर लंबी एमटी-५ सुरंग, जो विरार और बोईसर के बीच बनाई गई है, मंत्रालय के मुताबिक १८ महीनों में पूरी की गई, लेकिन स्थानीय नागरिकों की तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। उनका आरोप है कि सुरंग निर्माण के दौरान तेज धमाके, जमीन में कंपन और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर कई बार शिकायतें की गर्इं, मगर प्रशासन ने हर बार चुप्पी साध ली। मुंबइ-अमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना की कुल लागत लगातार बढ़ती जा रही है। ५०८ किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट में २७ किलोमीटर से अधिक सुरंगें प्रस्तावित हैं, जिससे खर्च और समय दोनों को लेकर संदेह और गहराता जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो अंतिम लागत सामने आई है और न ही टिकट किराए को लेकर सरकार ने कोई स्पष्ट जानकारी दी है।
सरकार दावा कर रही है कि मुंबई से अमदाबाद का सफर महज १ घंटा ५८ मिनट में पूरा होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तेज रफ्तार सफर मध्यम वर्ग की पहुंच में होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि संभावित किराया आम यात्रियों की जेब पर भारी पड़ सकता है। रोजगार सृजन के सरकारी दावों पर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, अधिकतर नौकरियां केवल निर्माण कार्य तक सीमित हैं, जबकि स्थायी रोजगार को लेकर अब तक कोई ठोस आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। पर्यावरणीय मोर्चे पर भी सरकार की चुप्पी खल रही है। पेड़ कटाई, पहाड़ी इलाकों में ब्लास्टिंग और सुरंग निर्माण से हुए नुकसान को लेकर स्थानीय स्तर पर भारी असंतोष है, लेकिन सरकार इन सवालों से आंखें मूंदे बैठी है। नतीजा साफ है कि पालघर में सुरंग का ब्रेकथ्रू भले ही तकनीकी सफलता हो, लेकिन बढ़ती लागत, पारदर्शिता की कमी, पर्यावरणीय नुकसान, मध्यम वर्ग की अनिश्चित पहुंच और मुंबई के पत्रकारों की अनदेखी ने इस महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

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