मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : देश में शिक्षा नहीं, परीक्षा इंडस्ट्री चल रही है!

दिल्ली लाइव : देश में शिक्षा नहीं, परीक्षा इंडस्ट्री चल रही है!

अरुण कुमार गुप्ता

यदि हम यह कहें कि इस समय देश में शिक्षा नहीं, परीक्षा इंडस्ट्री चल रही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश में पांच बड़ी परीक्षाएं नीट, जेईई, आरआरबी, यूपीएससी और एसएससी पास करने के लिए बच्चे और उनके अभिभावक अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, वे इन परीक्षाओं पर सालाना ३.५० लाख करोड़ रुपए खर्च करते हैं। यह खर्च भारत सरकार के शिक्षा बजट का करीब तीन गुना है। यदि हम विपक्ष के नेता राहुल गांधी की मानें तो यह केवल शिक्षा बजट ही नहीं बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, विज्ञान और महिला तथा बाल कल्याण इन पांच बड़े मंत्रालयों के बजट को मिला लिया जाए तो भी उससे ज्यादा है। वर्ष २०२६-२०१७ में उच्च शिक्षा का पूरा बजट ५५,७२७ करोड़ रुपए है। देश के तमाम आईआईटी के लिए १२,१२३ करोड़, एनआईटी के लिए ६,२६० करोड़ यानी छात्र इन प्रवेश परीक्षाओं को पास करने के लिए जो पैसे खर्च कर रहे हैं, वह उस बजट से कहीं बहुत ज्यादा है, जो सरकार शिक्षा व्यवस्था के लिए खर्च करती है। सवाल यह है कि क्या हम ऐसी व्यवस्था बना चुके हैं, जहां शिक्षा का उद्देश्य सीखना नहीं रह गया है, बल्कि परीक्षा पास करना हो गया है। सोच कर देखिए जो ३.५० लाख करोड़ रुपए पांच बड़ी परीक्षाओं को पास करने के लिए बच्चे खर्च कर रहे हैं, इस खर्च पर सरकार को कितना रिवेन्यू मिलता होगा। बच्चों के इन पैसों पर जीएसटी भी लगता होगा, जिसे हम कोचिंग इंडस्ट्री कहते हैं उसकी आय पर भी आयकर लगता होगा। अब आप सोचिए साढ़े तीन लाख करोड़ पर सरकार कितना रिवेन्यू ले रही होगी। यह भी कह सकते हैं कि कोचिंग इंडस्ट्री भारत सरकार को एक तरह से फंड दे रही है। सरकार शिक्षा व्यवस्था के लिए जितना खर्च कर रही है उससे कहीं ज्यादा तो कोचिंग इंडस्ट्री से ही उसे मिल रहा है।
मोदीजी का पुराना नुस्खा भी फेल!
नीट पेपर लीक मामले ने इतना तूल पकड़ा कि जेन-जी यानी युवाओं को सड़क पर उतरना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़नी पड़ी। यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि पेपर लीक पकड़ा वैâसे गया। राजस्थान के सीकर में मकान मालिक कोचिंग सेंटर में पीडीएफ कापी लेकर पहुंचा और कोचिंग सेंटर के टीचर ने स्कोर किया ४५ में ४५ नंबर। अब नीट का पेपर कितने में बिका यह जांच कर रही सीबीआई बताएगी। अब आप सोचिए, जिस देश में पेपर सड़क पर घूम रहा हो, उस देश में बच्चे सड़क पर नहीं उतरेंगे तो कहां जाएंगे। बच्चे सड़क पर उतरे और मोदीजी का पुराना नुस्खा भी फेल हो गया। मोदीजी का पुराना नुस्खा था कि आंदोलन का जो भी लीडर हो उसे देश विरोधी, पाकिस्तान समर्थक, वामपंथी और चीन समर्थक बता दो। इसी बात का जनता के दिमाग में भ्रम डाल दो और जनता भ्रमित हो जाए। इसके बाद यदि आंदोलन का नेता मान गया तो ठीक, नहीं तो उसे इतना थका दो कि वह खुद ही आंदोलन छोड़ दे। किसानों के आंदोलन को याद कीजिए, मोदीजी ने किसानों को खालिस्तानी, आंदोलनजीवी, पहलवानों को लेकर भी ऐसी ही बातें, शाहीन बाग आंदोलन के लिए भी ऐसी ही बातें की, लेकिन इस बार यह नुस्खा फेल हो गया। क्योंकि आंदोलन किसी नेता या पार्टी का नहीं था, तो अब सरकार किस पर आरोप लगाए। कोई चेहरा नहीं, कोई झंडा नहीं, सिर्फ आंदोलन करने वाले बच्चे थे। जब सोनम वांगचुक आंदोलन से जुड़े तो सरकार को लगा कि एक गिरेबान मिल गया है, लेकिन जंतर मंतर पर देशभर से बच्चों की भीड़ आ गई और भीड़ ने सारा खेल पलट दिया। भीड़ ने क्लियर कर दिया कि हमें चेहरे से नहीं, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से मतलब है। अब सरकार बच्चों को बदनाम वैâसे करे, जिस आंदोलन का गिरेबान ही नहीं था, तो मोदी का पुराना फॉर्मूला हवा- हवाई हो गया है। यही वजह है कि मोदी सरकार को झुकना पड़ा।

अन्य समाचार