सामना संवाददाता / मुंबई
राज्य की कई मनापाओं में इस बार दबाव और गुंडागर्दी की राजनीति से प्रेरित निर्विरोध चुनाव लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बनकर सामने आया है। बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा अदृश्य दबाव के चलते नामांकन वापस लेने से सत्ताधारी दलों के उम्मीदवार चुनाव से पहले ही निर्विरोध विजयी घोषित हो गए हैं। इसे लेकर मुंबई ग्राहक पंचायत ने कड़ा ऐतराज जताया है और इसे जनतांत्रिक प्रक्रिया का खुला अपहरण बताया है।
ग्राहक पंचायत ने सवाल उठाया है कि जब उम्मीदवारों को दबाव में नामांकन वापस लेने पर मजबूर किया गया तो ऐसे मामलों में मतदाताओं के ‘नोटा’ के अधिकार का क्या हुआ? क्या मतदाताओं की असहमति दर्ज कराने का अधिकार भी उनसे छीना जा रहा है? निर्विरोध सीटों पर भी चुनाव कराएं जाने की मांग संगठन ने की है। पंचायत ने मांग की है कि ऐसे प्रभागों में जहां केवल एक उम्मीदवार शेष रह गया है, उसे विजयी घोषित करने के बजाय अनिवार्य रूप से चुनाव कराए जाएं, ताकि मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर नोटा के माध्यम से असहमति दर्ज करा सकें।
ग्राहक पंचायत के कार्याध्यक्ष एडवोकेट शिरीष देशपांडे ने चेतावनी दी है कि यदि चुनाव आयोग ने इस गंभीर मुद्दे पर ठोस और साहसी निर्णय नहीं लिया तो यह भविष्य के लिए गलत और खतरनाक मिसाल बनेगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
पैसे और दबाव की राजनीति
ग्राहक पंचायत का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सत्तारूढ़ दलों ने धनबल और दबावतंत्र का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है। यदि चुनावी मैदान में केवल एक ही उम्मीदवार बचता है तो उसे सीधे विजयी घोषित करना लोकतंत्र का मजाक उड़ाने के समान है।
