मुख्यपृष्ठस्तंभदुर्गाबाई व कमलाबाई फिल्माकाश की पहली तारिकाएं

दुर्गाबाई व कमलाबाई फिल्माकाश की पहली तारिकाएं

विमल मिश्र
मुंबई
सामाजिक बेड़ियों और वर्जनाओं को तोड़कर रुपहले पर्दे पर आने वाली दुर्गाबाई कामत भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री थीं। पुरुष प्रधान सत्ता उनके इस कदम से इतना रुष्ट हुई कि उन्हें समाज से ही बाहर कर दिया। महिलाओं के सिनेमा में आने के रास्ते उन्हीं के इस ‘दुस्साहस’ से खुले। उनकी बेटी कमलाबाई भारतीय सिनेमा की पहली बाल अभिनेत्री थीं। जुबेदा-पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ की नायिका बनीं और ड्रेस डिजाइनर भानु अथैया ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाली पहली भारतीय।
भारतीय फिल्मों के पितामह धुंडिराज गोविंद फालके ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ की शूटिंग के लिए तमाम इंतजाम पूरे कर लिए थे। बस, तारामती की भूमिका के लिए किसी नारी पात्र की तलाश बाकी थी। न घर से निकलने की आजादी, न कोई नौकरी या कारोबार-महिलाओं पर उन दिनों तरह-तरह की पाबंदियां थीं। घर की चहारदीवारी ही उनकी दुनिया होती थी। थिएटर और फिल्मों में अभिनय करने को तो बिलकुल ही ‘तुच्छ’ और निकृष्ट काम समझा जाता था। जो भी महिला या लड़की फिल्मों में काम करती थी, उसे समाज से ही बाहर कर दिया जाता था। ऐसे में नारी पात्रों की भूमिकाएं भी पुरुष पात्र को ही निभानी पड़ती थीं।
मित्रों, परिचितों तथा संबंधियों के दरवाजों से बैरंग लौट लाचारी में दादासाहब फालके को आखिरकार एक वेश्या के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ गई, पर उसने भी फिल्म में काम करने को अपने पेशे से घटिया बताकर उनके अनुरोध को ठुकरा दिया। वह सिर्फ एक शर्त पर इस फिल्म में अपनी बेटी को काम करने की अनुमति देने की हामी देने को राजी थी कि पहले उससे शादी कर लो।
वेश्या के यहां से बैरंग लौटे दादासाहब परेशानहाल एक होटल में चाय पीने के लिए गए हुए थे कि उन्होंने देखा कि जिस वेटर ने चाय लाकर सामने की मेज पर रखी, उसके हाव-भाव जनाना और उंगुलियां बड़ी नाजुक थीं। मान-मनौवल के बाद आखिरकार काम आ गई पैसों की लालच। इस तरह १९१३ में भारत की जो पहली फिल्म बनी उसकी नायिका तारामती कोई स्त्री न होकर स्त्री-वेश में एक पुरुष था-श्रीमान सालुंके। दादासाहेब ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ में महिलाओं के कपड़े पहनाकर नारी पात्र की ऐक्टिंग उससे ही करवाई थी। दादासाहब की अगली फिल्म ‘लंका-दहन’ में तो इन्हीं सालुंके ने दो भूमिकाएं निभार्इं-राम की भी और सीता की भी।
शुरुआती कोशिशों में विफल रहने के बावजूद दादासाहेब फालके ने हार नहीं मानी। आखिरकार अपनी दूसरी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ (१९१४) के लिए उन्हें दो नारी पात्र मिल ही गए-दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई। इस तरह भारतीय सिनेमा में फिल्मी पर्दे पर दिखाई देने वालीं पहली महिला बनीं दुर्गाबाई कामत। ‘मोहिनी-भस्मासुर’ में जहां दुर्गाबाई ने पार्वती का किरदार निभाया, वहीं कमलाबाई मोहिनी के किरदार में थीं। इस तरह कमलाबाई को भी भारतीय सिनेमा की पहली बाल कलाकार होने का गौरव हासिल हुआ। स्त्री रूप में दर्शकों को आकर्षित करने वाली पहली बाल-नायिका होने का श्रेय मंदाकिनी को हासिल हुआ, जो दादासाहब फालके की ही बिटिया थीं। मंदाकिनी ने तो कई फिल्मों में कृष्ण बनकर दर्शकों पर जादू ही कर डाला था।
दुर्गाबाई का विवाह आनंद कामत नासनोदकर नाम के एक शख्स से हुआ था, जो मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट में शिक्षक थे। १९०३ में दुर्गाबाई का पति से तलाक हो गया। कमलाबाई उस समय सिर्फ तीन वर्ष वर्ष की थीं, जिन्हें उन्होंने सिंगल मदर के रूप में पाला। एक तलाकशुदा स्त्री, विशेषकर एक अकेली मां के लिए उस वक्त समाज में कोई सम्मानजनक स्थान नहीं था। या तो वह किसी के घर में नौकरानी बन जाए या फिर धंधा करने लगे। दादासाहब ने दुर्गाबाई के सामने फिल्म का प्रस्ताव रखा तो समाज के डर से शुरू में वे भी हिचकिचार्इं, पर बेटी का मासूम चेहरा देखकर उसे स्वीकार कर लिया। फिल्म साइन करते समय उन्हें बिलकुल भी अंदाज नहीं था कि उनका यह कदम इतिहास बनाएगा और उन्हीं के कारण महिलाओं के सिनेमा में आने के रास्ते खुलेंगे।
तोड़ डालीं सारी वर्जनाएं और बंदिशें
फिल्मों में आगमन ने दुर्गाबाई के लिए पहाड़ जैसी मु‌श्किलें खड़ी कर दीं। पुरुष प्रधान समाज ने पहले तो ताने मारकर उनके निर्णय से विरत करने की कोशिशें कीं, फिर बहिष्कार शुरू कर दिया। आखिरकार समाज से ही निकाल बाहर किया। पर, आखिरकार समाज को हार माननी पड़ी। दुर्गाबाई की देखा-देखी अब अन्य महिलाएं भी फिल्मों में आने की हिम्मत दिखाने लगीं। दुर्गाबाई ने करीब ७० साल तक फिल्मों में काम किया। १७ मई, १९९७ को पुणे में उनका निधन हुआ, तब उनकी उम्र ११७ साल की बताई जाती थी। जिस तरह दुर्गाबाई भारतीय फिल्मों की पहली अभिनेत्री हैं उसी तरह कमलाबाई को भारतीय सिनेमा की पहला बाल कलाकार होने का गौरव हासिल है। कमलाबाई ने उन रामभाऊ के छोटे भाई रघुनाथ राव के साथ विवाह किया, जिनकी सामाजिक नाटक मंडली में वे मां दुर्गाबाई के साथ काम करती थीं। कालांतर में कमलाबाई की ख्याति विविध प्रकार की भूमिकाएं-जिनमें पुरुष भूमिकाएं भी थीं, करने के लिए पैâली। ‘गोपीचंद’ नाटक के दौरान पति के अचानक बीमार पड़ जाने से कमलाबाई को उनकी भूमिका भी निभानी पड़ी। रामायण की कथा पर आधारित एक नाटक के पहले दो अंकों में जहां उन्होंने क्रमश: मंथरा और वैâकेयी की भूमिकाएं कीं, तीसरे अंक में दशरथ बनकर भी मंच पर आर्इं। १९२७ में रघुनाथ राव की मृत्यु के बाद कमलाबाई ने कुछ समय तक चित्तहर्षक नाटक मंडली का संचालन भी किया। १९०६ से लेकर १९४४ तक उन्होंने कोई ७५ नाटकों में अभिनय किया। इनमें १९३० के दशक में वीर सावरकर के नाटक ‘उशाप’ में अभिनय भी शामिल है। उन्होंने ३५ फिल्मों में भी काम किया। उनकी आखिरी फिल्म ‘गहराई’ १९८० में आई।
कमलाबाई ने भी माता की तरह दीर्घायु पाई। १६ मई, १९९८ को ९८ वर्ष की आयु में पुणे में उनका देहांत हो गया। मराठी अभिनेता और गायक चंद्रकांत गोखले उनके पुत्र थे। अन्य पुत्र सूर्यकांत तथा लालजी गोखले विख्यात तबला वादक रहे हैं। अभिनेता विक्रम गोखले और मोहन गोखले उनके पोते थे।
जुबेदा-पहली सवाक फिल्म की नायिका
भारत की पहली बोलती फिल्म आर्देशिर ईरानी की ‘आलमआरा’ की नायिका जुबेदा ने जिप्सी बाला की भूमिका हो या पौराणिक चरित्र -सब में अपने शानदार अभिनय से जान पंâूक देती थी। शाहू मोडक और जाल मर्चेंट के साथ जुबेदा की जोड़ी विशेष लोकप्रिय रही। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘सेवा सदन’ पर इसी नाम से बनी सामाजिक फिल्म की नायिका भी वही थीं।
राज परिवार में पैदा और ब्याही जुबेदा ने धार्मिक फिल्मों में काम के लिए खास नाम कमाया। ‘वीर अभिमन्यु’ में वे उत्तरा बनीं तो ‘सुभद्रा हरण’ में सुभद्रा। ‘नंद के लाला’ में कृष्ण बने शाहू मोडक की वे ‘राधा’ थीं, जिसमें उनका गाया गीत गली-गली में बजा करता था ‘नंद के लाला मुरली वाला, तुझको लाखों प्रणाम’। एक मुस्लिम लड़की द्वारा गाया यह भजन कुछ कट्टर हिंदुओं को बहुत नागवार गुजरा था। ३६ गूंगी तथा २० बोलती फिल्मों में काम करने वाली जुबेदा की वृद्धावस्था बहुत एकाकी और निस्संग गुजरी। एक लाइलाज बीमारी के कारण उनका एक पैर काट देना पड़ा था। विवादों ने १९९० में मृत्युपर्यंत (आखिर में संपत्ति को लेकर) उनका पीछा नहीं छोड़ा।
भानु अथैया का डर
ड्रेस डिजाइनर भानु अथैया (२८ अप्रैल, १९२९-१५ अक्टूबर, २०२०) सर्वश्रेष्ठ माना जाने वाला ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाले पहली भारतीय थीं। यह कामयाबी उन्हें आठ ऑस्कर जीतने वाली रिचर्ड एटनबरो की ‌फिल्म ‘गांधी’ की ड्रेस डिजाइनिंग के लिए हासिल हुई। १०० से भी अधिक फिल्मों में ड्रेस डिजाइन कर गिनेस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने वाली भानु अथैया को हमेशा यह डर सताया करता था कि उनकी ऑस्कर ट्रॉफी कहीं चोरी न चली जाए। २०१२ में उन्होंने अपनीr ऑस्कर ट्रॉफी मरणोपरांत ऑस्कर ऑफिस में ही सुरक्षित स्थान पर रखे जाने की इच्छा जताई थी।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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