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संपादकीय : मोदी फिर ‘सफर’ में, बेरोजगार अधर में

हम सबके लाडले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर विदेश दौरे पर रवाना हो गए हैं। यानी कि मोदी अगले पूरे हफ्ते देश में नहीं हैं। मोदी घाना, त्रिनिदाद, टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील, नामीबिया की लंबी विदेश यात्रा पर विशेष विमान से निकले हैं। इस विदेश दौरे पर निकलने से पहले मोदी ने देश के बेरोजगारों को एक खूबसूरत सपना दिखाया, वो है दो साल में साढ़े तीन करोड़ नौकरियां देने का नया वादा। मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई। इसमें तमाम क्षेत्रों खासकर मैन्युपैâक्चरिंग क्षेत्र, रोजगार सृजन, रोजगार के अवसरों के विस्तार आदि में योजनाओं को मंजूरी दी गई। दरअसल, इस सरकार ने निर्णय तो बहुत किए हैं, लेकिन अगर वह अपने इन निर्णयों पर अडिग रहती तो पिछले दस सालों में देश का कायापलट हो गया होता और मोदी के कार्यकाल को लोग राष्ट्र निर्माण के दशक के तौर पर याद करते। मोदी पहली बार २०१४ में सत्ता में आए थे। हालांकि, इसके बाद के ११ सालों में उन्होंने सत्ता में आते वक्त किए गए किसी भी वादे को पूरा नहीं किया। उनका संकल्प था हर साल दो करोड़ रोजगार देने का, यानी पांच साल में दस करोड़ लोगों को रोजगार देने का। मोदी का यह तीसरा कार्यकाल है। पहले दो कार्यकाल में दस करोड़ लोगों को रोजगार मिलना था। वह नहीं हुआ और अब तीसरे कार्यकाल में एक साल बाद दो साल में साढ़े तीन करोड़ रोजगार देने का शगूफा छोड़ दिया गया है। अब कहा जाने लगा है कि देश में
अधिक नौकरियों का सृजन
हो इसलिए रोजगार उपलब्ध कराने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक लाख करोड़ रुपए के प्रावधान के साथ रोजगार संबंधी प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है। एक खूबसूरत ख्वाब दिखाते हुए बताया गया कि इसके जरिए अगले दो साल में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा रोजगार सृजित किए जाएंगे, लेकिन मोदी सरकार इस पर बात करने को तैयार नहीं है कि पिछले दस साल में कितनी नौकरियां दी गईं या वादे पूरे हुए या नहीं। देश के ८० करोड़ लोग मुफ्त राशन पर जीने को मजबूर या लाचार हैं। आर्थिक तंगी, साहूकार, महंगाई, बेरोजगारी के कारण लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे वक्त में ‘जीडीपी’ और चार-पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात करना एक तरह से बेईमानी है। जीडीपी के आंकड़े और करोड़ों बेरोजगारों के आंकड़े मेल नहीं खाते। देश इतिहास की सबसे खराब बेरोजगारी का सामना कर रहा है। नोटबंदी जैसे पैâसलों के चलते लाखों लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ीं। ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाओं ने बेरोजगार युवाओं और फौज का मजाक उड़ाया है। रेलवे, बैंक, एलआईसी, सार्वजनिक उपक्रमों से नौकरियां कम की जा रही हैं। भारत में नागर विमानन क्षेत्र भी चरमरा गया है। क्योंकि इस क्षेत्र के लिए कोई नीति नहीं है और सत्ताधारियों की भूमिका स्वार्थी है। किंगफिशर, जेट, गो एयर जैसी एयरलाइंस कंपनियां बंद पड़ गईं या फिर किसी की मदद करने के उद्देश्य से इन्हें बंद किया गया, यह शोध का विषय है। इससे इस क्षेत्र के हजारों तकनीशियन और कर्मचारी बेरोजगार हो गए।
बेरोजगारी के सवाल पर
मोदी सरकार ने कभी भी गंभीरतापूर्वक अपनी भूमिका नहीं रखी। कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र था। वहां भी अब कुछ भरोसे लायक नहीं रहा। नई पीढ़ी खेती करने को तैयार नहीं है। सूखा, मौसम का बेमौसमी कहर और कृषि उत्पादों को न मिलने वाला गारंटी दाम इस क्षेत्र में संकट पैदा कर रहे हैं। नौकरी के लिए अमेरिका गए भारतीय युवाओं को जंजीरों में बांधकर वापस भारत भेजा जा रहा है। इसका मतलब है कि देश पर बेरोजगारी का नया बोझ पड़ रहा है। देश में कालाधन कई गुना बढ़ गया है। भारत का कालाधन विदेशी बैंकों में जा रहा है, लेकिन देश में रोजगार का प्रवाह ही रुक गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था धरातल पर पहुंच गई है और मोदी के लोग पांच ट्रिलियन की बात कर रहे हैं। यह देश के साथ धोखा है। मोदी सरकार का झुकाव मुफ्त अनाज, बेरोजगारी भत्ता, लाडली बहनों के लिए मासिक भत्ता जैसी ‘मुफ्त’ चीजों की ओर है। ये योजनाएं इस तरह की हैं, ताकि यह वर्ग मोदी को भगवान मानने लगे और भाजपा का गुलाम बन जाए। मोदी का लक्ष्य देश में निवेश बढ़ाना, बुनियादी ढांचे, बड़े उद्योगों, सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से रोजगार पैदा करना नहीं है। व्यापार के बदले मोदी ने पाकिस्तान के साथ युद्धविराम किया। यह व्यापार अंतत: अडानी ही करेगा और देश में बेरोजगार केवल मुफ्त भत्ते पर जिंदगी गुजारेंगे। मोदी सरकार के पास रोजगार वृद्धि को बढ़ावा देने वाला दृष्टिकोण नहीं है। फिर भी इस सरकार ने दो साल में साढ़े तीन करोड़ नौकरियों के नए वादे किए हैं। इस तरह धूल झोंककर प्रधानमंत्री मोदी कुछ देशों के दौरे पर चले गए हैं। मोदी फिर से ‘दौरे’ पर हैं और बेरोजगार रामभरोसे, ऐसे ही हालात देश के हैं।

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