भारत के महान लोकतंत्र की धज्जियां चुनाव आयोग किस तरह उड़ा रहा है, इसका विस्तृत खुलासा ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने किया है। फिलहाल, चल रही ‘एसआईआर’ प्रक्रिया एक घोटाला है। यह लोकतंत्र के गले का फंदा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार किसी माफिया की तरह मनमानी करके भाजपा की मर्जी के मुताबिक करोड़ों मतदाताओं के नाम हटा या जोड़ रहे हैं, इसका खुलासा अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने किया। चुनाव आयोग तीन सदस्यों से बनता है, लेकिन पैâसले बहुमत से नहीं हो रहे हैं। ज्ञानेश कुमार की इस माफिया शैली के खिलाफ दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा पिछले दस महीनों में चौदह बार आपत्ति जताने का भी कोई असर नहीं हुआ। तब इन दोनों ने सीधे वैâबिनेट सचिव से ही शिकायत की। इसका अर्थ यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक यह गंभीर मामला पहुंचा और उसी कार्यालय से ज्ञानेश कुमार की मनमानी के खिलाफ यह विस्फोट हुआ। मोदी सरकार में काफी कुछ बिगड़ा हुआ है, यह उसका एक नमूना है। भारत का चुनाव आयोग गृह मंत्रालय के `अधीन’ है। इसलिए अमित शाह के आदेश के बिना ज्ञानेश कुमार मनमानी नहीं करेंगे, जिसे यह समझता है उसे यह बात पक्की तरह से ध्यान में रखनी चाहिए। देश के लोकतंत्र के साथ गद्दारी करने वाले पहले आरोपी गृह मंत्री अमित शाह और सह-आरोपी ज्ञानेश कुमार हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर आई जानकारी इन दोनों की कुर्सी हिला देने वाली है। भारत का चुनाव आयोग
एक संवैधानिक संस्था
है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाकर लोकतंत्र की रक्षा करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन विवेकहीन आचरण करके अपने अधिकारों का इस्तेमाल गली के गुंडे की तरह करने वाले ज्ञानेश कुमार के हाथों में लोकतंत्र की बागडोर चली गई है। ज्ञानेश कुमार की इस संवैधानिक गुंडागर्दी के खिलाफ अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने चौदह बार असहमति जताई, लेकिन ज्ञानेश कुमार ने इस असहमति को दरकिनार करके लोकतंत्र की पीठ में खंजर घोंपने का काम जारी रखा। ‘फॉर्म ६’ के मामले में संधू और जोशी ने आपत्ति जताई। ज्ञानेश कुमार ने उसे स्वीकार नहीं किया। एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर भारत से १३ करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। इसमें कई प्रतिष्ठित और नामचीन लोग शामिल हैं। महाराष्ट्र से दो करोड़ मतदाता हटाए गए। पश्चिम बंगाल और बिहार विधानसभा चुनावों में लाखों नाम हटाकर अमित शाह ने चुनाव जीते और इस जुर्म में ज्ञानेश कुमार की खुली सहभागिता थी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में ४२ लाख वोट अचानक बढ़ाकर भाजपा और उसके गैंग को जीत का रास्ता चुनाव आयोग ने ही दिखाया। पार्टी के विभाजन में, पार्टी और चुनाव चिह्न का स्वामित्व तय करने में राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार, इन दो संवैधानिक माफियाओं द्वारा किया गया कृत्य लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने वाला है। लोकतंत्र के ये दो जल्लाद हैं, तो गृह मंत्री अमित शाह उन जल्लादों के असली बाप हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने यह सारा मामला सामने लाया है। चुनाव आयुक्त संधू और विवेक जोशी द्वारा
लोकतंत्र बचाने के लिए
पुकारा गया यह बगावत का बिगुल है। इसके लिए देश उनका सदा ऋणी रहेगा। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव जैसे विपक्षी नेता चुनाव आयोग की इस माफियागीरी के खिलाफ लगातार बोल रहे थे। ज्ञानेश कुमार ने तो राहुल गांधी को ही आरोपी बना दिया और कहा, ‘हलफनामा देकर बोलिए।’ देश के चुनाव आयोग से बाहर आया यह पूरा मसला बेहद संगीन है। अमित शाह और ज्ञानेश कुमार के घोटालों के सबूत मौजूद हैं। इतना सब होने के बाद भी अगर भाजपा ज्ञानेश कुमार और अमित शाह का बचाव करेगी, तो उसे देशभक्ति के गीत गाने का कोई हक नहीं है। राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार के दौर में चुनाव आयोग अमित शाह के घर का ‘घरेलू नौकर’ बन गया। हम चाहे जितनी मनमानी कर लें, हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा? इसी दंभ में वह डोलता रहा। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं और पूरी व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ चुका है। जिन दो-पांच प्रतिशत लोगों का भरोसा बचा भी था, वह भी खत्म हो गया है। अमित शाह और ज्ञानेश कुमार जैसे लोग जब तक पदों पर हैं, तब तक भारत के संविधान का कोई अर्थ नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री को इन्हें तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए। तभी देश बचेगा और मोदी बचेंगे। अमित शाह और ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे। इसलिए उन्हें हटाना ही मोदी के सामने एकमात्र विकल्प है। देश बचाने का यह आखिरी मौका मोदी के पास है। ५६ इंच की छाती दिखाने का यह मौका मोदी को नहीं गंवाना चाहिए!
