मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : मनपा का नया अभियान मुंबई में गरीब कहां जाएं?

विजय-विमर्श : मनपा का नया अभियान मुंबई में गरीब कहां जाएं?

-विजयशंकर चतुर्वेदी

मुंबई में करीब हफ्तेभर बाद, ३९ हजार से अधिक झोपड़ियों पर कार्रवाई की तैयारी ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महाराष्ट्र में अनधिकृत निर्माण हटाने की नीति पुनर्वास नीति के साथ चल रही है या दोनों के बीच अब भी जमीन-आसमान का फर्क है? मनपा ने १ अक्टूबर से ३१ दिसंबर तक विशेष तोड़-फोड़ अभियान चलाने का एलान किया है।
१४ फुट की प्राचीन सीमा पर सवाल
महानगर में अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई कोई नई बात नहीं। नई बात उसका पैमाना है। मनपा के मुताबिक, मुंबई और उपनगरों में १४ फुट या उससे अधिक ऊंचाई वाली ३९,१११ झोपड़ियों की पहचान हुई है। इनमें ३१,२२७ पूर्वी उपनगरों में हैं। लेकिन सवाल इसी १४ फुट की सीमा पर उठ रहे हैं। यह सीमा जिस कानूनी प्रावधान से जुड़ी है, वह १८८८ के मुंबई नगर निगम अधिनियम से संबंधित है। २०२६ की मुंबई की आबादी, जमीन की कीमत, निर्माण पद्धति और आवास संकट को देखते हुए यह पूछना स्वाभाविक है कि इतने पुराने प्रावधान को उसी रूप में लागू करना आज के शहर की वास्तविकताओं के लिए कितना वास्तविक है?
इसको पुनर्वास नहीं कहते
अधिकारियों का कहना है कि इस कार्रवाई का मकसद असुरक्षित और अनधिकृत निर्माणों से जुड़े जोखिम को कम करना है। हाल की दुर्घटनाओं और भूस्खलन की घटनाओं के बाद उनके इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी परिवार का घर तोड़ना सिर्फ अनधिकृत निर्माण संबंधी कार्रवाई नहीं रह जाती। सामान बाहर निकालना, बच्चों की पढ़ाई बाधित होना, काम पर जाने की मुश्किलें और कई मामलों में परिवार का अस्थायी रूप से कहीं और चले जाना इसके तात्कालिक परिणाम होते हैं। किसी इमारत को खाली कराने और उसके निवासियों को वैकल्पिक आवास देने के बीच का अंतर प्रशासनिक रूप से जितना छोटा होना चाहिए, व्यवहार में उतना होता नहीं। मुंबई जैसे शहर में आदमी की जरूरतें किसी भौगोलिक दायरे से जुड़ी होती हैं। इसलिए दूर किसी जगह पर एक कमरा उपलब्ध करा देने का नाम पुनर्वास नहीं हो सकता।
निर्माण अनधिकृत होगा, आदमी नहीं
मनपा द्वारा चिह्नित हजारों अवैध झोपड़ियों की संख्या यह नहीं बताती कि इनमें कितने परिवार रहते हैं, कितनी संरचनाएं पहले से किसी पुनर्वास योजना में शामिल हैं, कितने मामलों में जमीन या निर्माण को लेकर विवाद है और कितने परिवारों को तत्काल वैकल्पिक आवास की जरूरत होगी। मनपा अधिकारियों को चाहिए कि वे इतने बड़े अभियान से पहले प्रभावित संरचनाओं की वास्तविक सूची, कार्रवाई के मानदंड, नोटिस देने की प्रक्रिया, पुनर्वास की पात्रता और उपलब्ध वैकल्पिक आवास के बारे में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करें। अनधिकृत निर्माण और उसमें रहने वाले व्यक्ति को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अवैध निर्माण पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उसमें रहने वाले परिवार के पुनर्वास का प्रश्न पूर्णतया वैध है।
पुनर्वास और तोड़-फोड़ की असमान गति
महाराष्ट्र में झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण यानी एसआरए की व्यवस्था लंबे समय से मौजूद है। मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में पुनर्वास योजनाओं और झोपड़पट्टी पुनर्वास क्षेत्रों से संबंधित आदेश भी समय-समय पर जारी होते रहे हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पुनर्वास का कोई तंत्र ही नहीं है। असली सवाल उसकी क्षमता, गति और जमीनी अमल का है। यदि किसी इलाके में पहले तोड़-फोड़ होती है और पुनर्वास बाद में, तो बीच की अवधि का असहनीय बोझ विस्थापित परिवार पर ही पड़ता है।
कांग्रेस की वर्षा गायकवाड़ और समाजवादी पार्टी के रईस शेख ने भी प्रभावित लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना कार्रवाई नहीं करने की मांग की है। यह एक राजनीतिक पक्ष हो सकता है। लेकिन यह प्रश्न तो आप भी पूछ सकते हैं कि तोड़क कार्रवाई से प्रभावित परिवारों के लिए ठोस व्यवस्था क्या है?
नोटिस देना जिम्मेदारी की समाप्ति नहीं
सार्वजनिक सुरक्षा और कानून का पालन किसी भी शहर की बुनियादी जिम्मेदारी होती है। लेकिन यह स्पष्ट रूप से तय होना चाहिए कि कहां तत्काल खाली कराना जरूरी है, कहां मरम्मत संभव है और कहां पुनर्वास के बाद ही कार्रवाई की जा सकती है। केवल नोटिस देकर जिम्मेदारी समाप्त न समझी जाए। मुंबई का आवास संकट एक दिन में पैदा नहीं हुआ है और उक्त ३९ हजार झोपड़ियों पर कार्रवाई से खत्म भी नहीं होगा। लेकिन यह अभियान बीएमसी और राज्य सरकार के लिए अपनी पुनर्वास नीति और प्रक्रिया को स्पष्ट करने का अवसर बन सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि व राष्ट्रीय नीति एवं भू-राजनीतिक विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।)

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