सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के १५ दिन बीत गए हैं। जंतर-मंतर के खुले मंच पर वे देश की युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए उपवास पर बैठे हैं। उनकी सेहत बिगड़ती जा रही है और उनका वजन दस किलो कम हो गया है। इस वजह से वांगचुक के समर्थक और शुभचिंतक बेहद चिंता में हैं। वांगचुक का यह अनशन किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं है। उनकी मुख्य मांग यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और छात्रों पर उपकार करें। प्रधान का इस्तीफा क्यों जरूरी है? मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षा नीट में बड़ा घोटाला हुआ। ‘नीट’ परीक्षा के पेपर लीक होने से सरकार की काफी किरकिरी हुई। बार-बार पेपर लीक होने की वजह से जनता का गुस्सा भड़क उठा। आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को यह परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी। पेपर लीक मामले में जो आरोपी पकड़े गए, वे सभी भाजपा परिवार से जुड़े हुए निकले, यह बात साफ हो गई। सरकार ने स्टैंड लिया कि परीक्षा के नए प्रश्नपत्रों को सेना और वायु सेना की निगरानी में सुरक्षित रखा जाएगा। यह तो हद ही हो गई। देश के लाखों छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया गया। कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली। चूंकि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इसके लिए जिम्मेदार हैं इसलिए देश के युवाओं की मांग है कि वे इस्तीफा दें। जब सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया, तब सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया। अनशन को १५ दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने इस आंदोलन की कोई सुध नहीं ली। इस दौरान पीएम मोदी चार-पांच देशों का दौरा कर आए और एक-दो नए ‘मेडल’ लेकर दिल्ली लौटे। इसी बीच अयोध्या के राम मंदिर की लूट भी सामने आई। इन सब बातों से कहीं ज्यादा जरूरी वांगचुक का अनशन है। वांगचुक हिमालय के एक सीधे-सादे, निस्वार्थी कार्यकर्ता हैं। वे पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ते हैं। वे एक नया एजुकेशनल मॉडल लेकर
हिमालय की गोद में
काम करते हैं। उनसे प्रेरणा लेकर आमिर खान एक शानदार फिल्म बनाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ‘मन की बात’ में उनके काम की तारीफ करते हैं। वांगचुक को ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जाता है, लेकिन वही वांगचुक जब लेह-लद्दाख की जनता के अधिकारों के लिए सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं तो सरकार को उनसे डर लगने लगता है। वांगचुक ने लद्दाख में चीन की घुसपैठ का मुद्दा उठाया। उन्होंने दुनिया को चिल्ला-चिल्लाकर बताया कि चीनी ड्रैगन लद्दाख को निगल रहा है तो मोदी सरकार ने वांगचुक को अवैध रूप से गिरफ्तार कर लिया। उन्हें देशद्रोही बताकर जेल में डाल दिया। भारत सरकार की यह नीयत बेहद घटिया है। संविधान की धज्जियां उड़ाकर एक तरह से तानाशाही तरीके से राज चलाया जा रहा है। धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा जगत की कोई महान शख्सियत नहीं हैं। वे डॉ. राधाकृष्णन, मौलाना आजाद, नरसिम्हा राव या अर्जुन सिंह जैसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने शिक्षा विभाग को एक नई दिशा दी हो। उनके कार्यकाल में कई विश्वविद्यालयों में भ्रष्ट कुलपतियों की नियुक्तियां हुर्इं, जिन्होंने शैक्षणिक संस्थानों को बर्बाद कर दिया। राष्ट्रीय परीक्षाओं का हाल विधायकों-सांसदों की तरह ‘घोड़े-बाजार’ (खरीद-फरोख्त) जैसा हो गया। लाखों रुपए देकर प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगे और जब किसी ने इस पर आवाज उठाई तो प्रधान ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई। यह किस बात के लक्षण हैं? वांगचुक इस मुद्दे पर अनशन पर बैठे हैं। सरकारी प्रतिनिधि उनसे मिलकर कोई समाधान निकाल सकते थे, लेकिन मोदी सरकार को लगता है कि वांगचुक जैसे भले लोगों को जीना ही नहीं चाहिए। आजादी से पहले जब महात्मा गांधी अनशन पर बैठते थे तो ब्रिटिश सरकार भी उनका उपवास तुड़वाने के लिए दौड़-धूप करती थी। समाधान और मध्यस्थता के जरिए गांधी जी की जान बचाई जाती थी। लेकिन मोदी सरकार में
इतनी भी शराफत नहीं
बची कि वह वांगचुक से बात तक करे। साल २०११ में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब अन्ना हजारे ने जनलोकपाल विधेयक के लिए रामलीला मैदान में ११ दिनों तक अनशन किया था। तब मनमोहन सरकार ने हजारे से बातचीत करने के लिए कई प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्रियों को भेजा था। अन्ना के सामने समाधान और विकल्प रखे गए, संवाद साधा गया। भाजपा ने तब अन्ना के आंदोलन को ‘जन आक्रोश’ और ‘जनता की आवाज’ कहकर समर्थन दिया था। आज वही भाजपा सत्ता में है और वांगचुक के आंदोलन को ‘राजनीतिक साजिश’ बताकर खारिज कर रही है। यह सरासर ढोंग है। वांगचुक का यह आंदोलन राष्ट्रहित में है। बारह साल पहले युवाओं की एकजुटता ने ही मोदी को सत्ता में पहुंचाया था। जैसे ही भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, युवाओं ने उन्हें बड़े पैमाने पर समर्थन दिया। लोकसभा चुनावों में अभी एक साल का वक्त था, लेकिन मोदी ने अपने प्रचार की शुरुआत फर्ग्यूसन कॉलेज के छात्रों के सामने भाषण देकर की थी। मोदी ने कई बार ‘परीक्षा पे चर्चा’ जैसे कार्यक्रमों का प्रसारण किया, लेकिन आज उन्हीं परीक्षाओं का बाजार उजड़ चुका है और मोदी इस पर चर्चा करने को तैयार नहीं हैं। हिमालय का सुपुत्र सोनम वांगचुक मोदी के घर के सामने, राष्ट्रपति के दरवाजे पर १५ दिनों से अन्न-जल त्याग कर लड़ रहा है। उनका शरीर सूख गया है, सांसें लड़खड़ा रही हैं, आवाज कमजोर हो चुकी है; लेकिन मोदी एक नाकाम और कामचोर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को गोद में लेकर बैठे हैं। सोनम वांगचुक की जान बचाना बेहद जरूरी है। सबसे पहले, अगर अन्ना हजारे की आत्मा जिंदा है तो उन्हें दिल्ली जाना चाहिए, वांगचुक का सिर अपनी गोद में लेना चाहिए और खुद अनशन का हथियार उठाना चाहिए। देश के सभी विपक्षी दलों को ‘जंतर-मंतर’ पर डेरा डाल देना चाहिए और जिन युवाओं के लिए वांगचुक ने अपनी जान दांव पर लगा दी है, वह युवा पीढ़ी आज किस बिल में जाकर छिप गई है? युवाओं को ‘जय हिंद’ के नारे लगाते हुए जगह-जगह सरकार को घुटनों पर लाना चाहिए। वांगचुक की इस लड़ाई को पूरे देश की लड़ाई बन जाने दो!
