-डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था निर्वाचन आयोग लोकतंत्र की आत्मा है, इसे खोया तो सब कुछ खो देंगे!
-एस. वाई. कुरैशी की पुस्तक में दर्ज घटना ने दिखाया आयोग को आईना
-आज आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवालों से सत्ता को फर्क क्यों नहीं पड़ता?
`एस. वाई. कुरैशी की यह पुस्तक १६ जुलाई २०२६ को रिलीज हो रही है। प्रकाशन समूह हेचिट्ट इंडिया द्वारा इस पुस्तक की आधिकारिक रिलीज से ठीक पहले इसके कुछ महत्वपूर्ण अंश और संस्मरण मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं।’
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
एक दौर था, जब चुनाव आयोग की नाराजगी से देश के प्रधानमंत्री भी बेचैन हो जाता था। आयोग की प्रतिष्ठा पर आंच आने की आशंका भर से सरकार सफाई देने लगती थी। आज हालात उलट गए हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है, मतदाता सूचियों से लेकर पार्टी के नाम और चुनाव-चिह्न के फैसलों तक आरोपों की बौछार हो रही है, लेकिन सत्ता के चेहरे पर न चिंता दिखाई देती है, न आत्ममंथन। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर’ में २०१२ की एक ऐसी घटना का उल्लेख किया है, जो आज की व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने अल्पसंख्यक आरक्षण को लेकर चुनावी घोषणा की थी। निर्वाचन आयोग ने इसे गंभीरता से लिया। आयोग के अधिकार और उसकी कार्रवाई को लेकर कुछ मंत्रियों ने बयानबाजी शुरू की तो तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी आहत हो गए। उन्होंने अपनी नाराजगी प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुरैशी से कहा था, ‘मैं आत्महत्या कर लूंगा।’ उनके इन शब्दों का आशय यह था कि उनकी सरकार चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कल्पना भी नहीं कर सकती। मनमोहन सिंह ने निर्वाचन आयोग को केवल ‘भारत का गौरव’ नहीं, बल्कि ‘देश के लोकतंत्र की आत्मा’ बताया था। उन्होंने कहा था कि यदि हमने इस संस्था को खो दिया तो सब कुछ खो देंगे। आज यही सवाल पूरे देश के सामने खड़ा है, क्या चुनाव आयोग अब भी लोकतंत्र की वही आत्मा है या सत्ता की सुविधानुसार फैसले देने वाली संस्था बनता जा रहा है? कभी आयोग की चेतावनी से मंत्री अपनी भाषा बदल लेते थे। राजनीतिक दल आचार संहिता तोड़ने से पहले दस बार सोचते थे। आज विपक्ष आरोप लगा रहा है कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ भाजपा के लिए सहायक संस्था की तरह काम कर रहा है। चुनावी रेफरी पर ही यदि एक टीम की जर्सी पहनने का संदेह हो जाए तो मुकाबला कितना निष्पक्ष रह जाएगा?
चुनाव आयोग की कुर्सी यदि सत्ता की ओर झुक तो पूरे लोकतंत्र की रीढ़ टूटने लगती है!
आयोग पर मतदाता सूचियों में कथित छंटनी, विपक्षी शिकायतों पर सुस्ती, सत्तापक्ष के नेताओं के विवादित बयानों पर नरमी और राजनीतिक दलों के नाम तथा चुनाव-चिह्न से जुड़े विवादों में असमान व्यवहार के आरोप हैं। जुलाई २०२६ में २३ विपक्षी दलों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए मुख्य न्यायाधीश तक अपनी शिकायत पहुंचाई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि आयोग की कार्यप्रणाली से निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद कमजोर हो रही है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग केवल चुनाव करानेवाला कार्यालय नहीं होता, वह सत्ता और विपक्ष के बीच खड़ा संवैधानिक रेफरी है। रेफरी का पैâसला तभी स्वीकार किया जाता है, जब उसकी नीयत, नियम और कार्रवाई तीनों पर भरोसा हो। केवल निष्पक्ष होने का दावा काफी नहीं है। आयोग को अपने पैâसलों और व्यवहार से निष्पक्ष दिखाई भी देना होगा। राजनीतिक दलों में टूट के बाद असली पार्टी किसकी है, नाम और चुनाव-चिह्न किस गुट को मिलेगा, इसका पैâसला चुनाव आयोग करता है। यह पैâसला किसी नेता या गुट के लिए राजनीतिक जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन सकता है। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ऐसे पैâसलों ने पूरी राजनीति की दिशा बदल दी। ऐसे में आयोग के प्रत्येक आदेश में एक ही कसौटी, स्पष्ट तर्क और पूरी पारदर्शिता दिखाई देनी चाहिए। आरोप यही है कि सत्ता पहले दलों में टूट कराती है, फिर विधायकों-सांसदों को अपने खेमे में लाती है और उसके बाद संवैधानिक संस्थाओं के पैâसले उस राजनीतिक कब्जे को वैधता प्रदान कर देते हैं।
लोकतंत्र और विश्वास
लोकतंत्र केवल मतपेटी या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से नहीं चलता। वह विश्वास से चलता है। जिस दिन मतदाता को लगने लगे कि वोट डालने से पहले ही मैदान, नियम और रेफरी तय हो चुके हैं, उस दिन चुनाव केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
अंतर केवल मनमोहन सिंह और मौजूदा सत्ता का नहीं है। अंतर संवैधानिक संस्थाओं को देखने की मानसिकता का है। तब चुनाव आयोग की नाराजगी से प्रधानमंत्री व्यथित हो जाते थे। आज आयोग पर पक्षपात के इतने गंभीर आरोप लगने के बाद भी सत्ता को कोई बेचैनी नहीं होती। उलटे सवाल उठानेवालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
जनता का विश्वास टूटा
आज जब सामान्य मतदाता भी आयोग के पैâसलों पर शक करने लगा है। यदि जनता का भरोसा उठ गया तो आयोग के पास कानून की शक्तियां तो बचेंगी, लेकिन नैतिक अधिकार समाप्त हो जाएगा। चुनाव आयोग अदालत की तरह केवल आदेश सुनाकर मुक्त नहीं हो सकता। उसे जनता को भरोसा दिलाना होगा कि उसके लिए प्रधानमंत्री और विपक्ष का सामान्य कार्यकर्ता बराबर हैं। उसे साबित करना होगा कि वह न भाजपा का कर्मचारी है, न किसी सरकार का प्रवक्ता और न सत्ता परिवर्तन रोकने का औजार। वह केवल संविधान का प्रहरी है।
आज आयोग की चुप्पी, चयनात्मक कठोरता और विवादित पैâसलों ने उसे गंभीर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। चुनाव आयोग को तय करना होगा कि वह इतिहास में लोकतंत्र के रक्षक के रूप में दर्ज होना चाहता है या सत्ता के दरबार में खड़े एक आज्ञाकारी कर्मचारी के रूप में। क्योंकि चुनाव आयोग की कुर्सी यदि सत्ता की ओर झुकती दिखाई दे तो केवल एक संस्था नहीं गिरती, पूरे लोकतंत्र की रीढ़ टूटने लगती है।
