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शहर की कहानी मुंबईकरों की जुबानी…मुंबई की सड़कों पर दौड़ता काल!

-५ महीने, २४९ हादसे और १० मौत

-‘बेस्ट’ बसों से अब तक ४६ मुंबईकर अपाहिज

द्रुप्ति झा / मुंबई

मुंबई की दूसरी लाइफलाइन कही जाने वाली बेस्ट बसें अब मुंबईकरों के लिए ‘सड़क पर दौड़ता काल’ बन चुकी हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, निजी ठेकेदारों के भरोसे चल रही वेट-लीज बसों ने मात्र ५ महीनों जनवरी से मई २०२६ में २४९ दुर्घटनाओं को अंजाम देकर १० मासूमों की जान ले ली और ४६ लोगों को जीवनभर के लिए अपाहिज बना दिया है। मई का महीना तो जैसे काल बनकर टूट पड़ा। हाल ही के दिनों में हुई बेस्ट दुर्घटनाओं में अंधेरी, मालाड, दादर और भांडुप की सड़कों पर जो हुआ, उसने आम जनता के भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है।
बेस्ट बस के जानलेवा सिस्टम पर मुंबईकरों का अब गुस्सा फूट पड़ा है। दादर निवासी रमेश सावंत ने कहा कि हम सफर नहीं कर रहे, मौत से खेल रहे हैं। जब हम घर से निकलते हैं, तब गारंटी नहीं होती कि सुरक्षित लौटेंगे या नहीं। बेस्ट प्रशासन को लागत बचानी है, मुनाफा कमाना है, लेकिन हमारी जान की कीमत पर! निजी ठेकेदार सिर्फ पैसा कमाना जानते हैं, बसों के रखरखाव से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। कांदिवली में रहने वाली सुनंदा पाटील ने कहा कि बेस्ट बस की ब्रेक फेल और स्टीयरिंग ढीले हैं, फिर भी सड़कों पर दौड़ाई जा रही हैं।
२ अप्रैल को ही बेस्ट कमेटी के सदस्य डॉ. नितिन नंदगांवकर ने लिखित चेतावनी दी थी कि इन ठेके वाली बसों के ब्रेक और स्टीयरिंग सिस्टम में गंभीर तकनीकी खराबी है। इंजीनियरिंग विभाग को भी यह पता था। लेकिन पैसों की भूख में इन खराब बसों को सड़कों पर उतार दिया गया।
पहले भी १४ वाहनों को रौंदा
१० जुलाई को अंधेरी-वेस्ट में जो हुआ, वह कोई साधारण घटना नहीं थी। रूट २४२ की एक अनियंत्रित बस ने एक के बाद एक १४ गाड़ियों को खिलौनों की तरह रौंद डाला। भांडुप बेस्ट दुर्घटना में भी बस अचानक पीछे भागने लगी थी। लोगों की ये भी शिकायत है कि चालकों को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, वे मोबाइल पर लगे रहते हैं और गाड़ियों का कोई फिटनेस टेस्ट नहीं होता, जिस वजह से बेस्ट का पूरा सिस्टम बदहाल नजर आ रहा है।
वेट-लीज बसों पर लगा प्रश्नचिह्न
जब तक इन ठेकेदारों की इलेक्ट्रिक बसों का सही से सुरक्षा ऑडिट नहीं होता और लापरवाह अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलता, तब तक यात्री सुरक्षित नहीं रहेंगे। मुंबईकर अब इस घटिया और असुरक्षित ‘वेट-लीज’ मॉडल से तंग आ चुके हैं। परिवहन विशेषज्ञों और नागरिकों की केवल एक ही मांग है, निजी ऑपरेटरों का ठेका तुरंत रद्द हो या उन पर सख्त कार्रवाई की जाए। बेस्ट को पर्याप्त फंड देकर खुद के स्वामित्व वाली बसें और प्रशिक्षित सरकारी ड्राइवर बहाल किए जाएं।

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