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संपादकीय : युद्ध किसे चाहिए?

‘इस्लामाबाद टॉक’ फेल हो गया, इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए? पाकिस्तान में वे ‘टॉक’ फेल हुए इसलिए आनंद व्यक्त करें या फिर से एक बार युद्ध छिड़ेगा, उसमें निर्दोष लोग, छोटे बच्चे नाहक मारे जाएंगे इसलिए दुख व्यक्त करें? शैतान की मध्यस्थता से ही सही, लेकिन युद्ध रुकना चाहिए ऐसा दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों और जनता को लग रहा है। वही भावना सही है। ‘टॉक’ फेल हुए इसका जिन्हें आनंद हुआ, वे मानवता के शत्रु हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस्लामाबाद से अमेरिका के लिए रवाना हुए। ये वार्ताएं फेल हुईं इसका सबसे ज्यादा आनंद भारत के भाजपा नेताओं को, मोदी और उनके अंधभक्तों को हुआ होगा। क्योंकि ‘इस्लामाबाद टॉक’ में विश्वगुरु का साधारण नामोल्लेख भी किसी ने नहीं किया। विश्वगुरु के बिना दुनिया का काम चल रहा है, लेकिन इस्लामाबाद में क्या होगा इसकी ओर दुनिया आंखें और कान लगाकर बैठी थी। पहले दिन कुछ विशेष घटित नहीं हुआ इसलिए अगले दस दिनों में सकारात्मक कदम नहीं उठेंगे, ऐसा कैसे कहा जा सकता है? युद्ध किसी को भी नहीं चाहिए, लेकिन युद्धखोरों को वह अपनी ही शर्तों पर रोकना है। युद्धविराम में भी हर कोई अपना फायदा देख रहा है। स्पेन, इटली जैसे राष्ट्रों ने सर्वप्रथम ट्रंप की युद्धखोरी का विरोध किया। प्रâांस के राष्ट्रपति ने भी प्रे. ट्रंप को सुनाया। पोप साहब भी शांति का संदेश लेकर खड़े हुए। प्रे. ट्रंप को सत्ता और पैसों का घमंड आ ही गया है। ट्रंप एक व्यापारी हैं। व्यापारी के हाथ में सत्ता चली जाए तो उसे मानवीय चीखों का कुछ भी महसूस नहीं होता। पोप ने कहा, ‘युद्ध समाप्त होना चाहिए।’ इस पर ट्रंप भड़ककर बोले, ‘पोप को इस झमेले में नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें मर्यादित रहना चाहिए। वरना हम उनकी सभी
विशेष सुविधाएं
बंद कर देंगे।’ इस पर पोप का उत्तर संयमित है। ‘ट्रंप को लगता है कि पूरी दुनिया उनके सामने घुटने टेके। उनकी मूर्तियां खड़ी करे। वह नहीं होगा। पैसों की पूजा कोई क्यों करे? शक्ति और सत्ता का प्रदर्शन अब बहुत हुआ। युद्ध रुकना चाहिए।’ पोप ईसाई हैं। ईरान और इजरायल, दुबई, कुवैत, बहरीन, इराक वगैरह राष्ट्र ईसाई नहीं हैं। वे मुसलमान, अरब या यहूदी हैं। फिर भी पोप ने शांति का संदेश देते हुए कहा कि युद्ध समाप्त होना चाहिए, लेकिन ईसाई धर्मी प्रे. ट्रंप उसे मानने को तैयार नहीं हैं। यह एक प्रकार से मानसिक बीमारी का आतंकवाद है। निर्दोष नागरिकों को मरते हुए और मारते हुए देखना, इसमें आनंद लेने वाले नेतन्याहू, प्रे. ट्रंप जैसे लोगों को विकृत ही कहना पड़ेगा। इसलिए इस्लामाबाद टॉक पहले दिन असफल हुआ इसका आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमेरिका ने इस शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद को चुना। प्रधानमंत्री मोदी ने अकल से काम लिया होता तो यह स्थान कश्मीर, शिमला, मनाली, शिलांग, महाबलेश्वर, दिल्ली, मुंबई ही क्या, राजनीतिक लाभ के लिए अमदाबाद या साबरमती भी हो सकता था। विश्वगुरु बड़ा डंका बजा सकते थे, लेकिन वे चुप रहे। प्रे. ट्रंप ने उन्हें युद्ध के मुद्दे पर मुंह पर उंगली रखकर चुप बैठने के आदेश दिए और नेतन्याहू के पास एपस्टीन फाइल्स का भंडार होने के कारण विश्वगुरु पांच राज्यों के चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे। सच तो यह है कि इन ‘टॉक’ के प्रचार होर्डिंग्स, स्वागत बैनर पर खुद की फोटो भी विश्वगुरु चमका सकते थे, लेकिन वह अवसर उन्हें ट्रंप ने नहीं दिया। बेशक, ऐसी वैश्विक घटनाओं की ‘मेहमाननवाजी’ कैसे करनी चाहिए इसका संयमित दर्शन पाकिस्तान ने कराया। वैश्विक प्रतिनिधिमंडल के स्वागत के जो पोस्टर लगे उसमें
किसी के भी फोटो
नहीं हैं। पाक के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बड़बोलेपन के फोटो नहीं हैं। इस्लामाबाद में उनके दल के नेताओं के फोटो नहीं हैं। इसलिए इस्लामाबाद टॉक को वैश्विक घटनाक्रम का रंग अपने आप चढ़ गया। यह चर्चा सफल नहीं हुई इसका अर्थ यह नहीं कि युद्ध तुरंत छिड़ जाएगा। अमेरिका का अहंकार ईरान ने ध्वस्त किया और वह घाव भरना अभी तो कठिन है। ईरान होर्मुज पर से नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। यूरेनियम का भंडार नष्ट करने को तैयार नहीं है। ईरान की मांग है कि उसकी दुनियाभर की संपत्ति अमेरिका मुक्त करे। अमेरिका उस पर विचार जरूर करेगा। ईरान के समुद्री मार्ग से जाने वाले जहाजों से ‘टोल’ वसूलने की भूमिका अमेरिका को मान्य नहीं है। दोबारा हमला नहीं होगा इसकी ‘गारंटी’ ईरान को चाहिए। इन मुद्दों पर आज चर्चा बिगड़ी भले ही हो, लेकिन चर्चा का पुल पूरी तरह ढहा नहीं है। इस पुल पर की आवाजाही रुकी है बस इतना ही। इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति चर्चा की रिपोर्टिंग करने के लिए दुनियाभर का मीडिया आया। उन्होंने इस्लामाबाद को नए सिरे से वैश्विक मानचित्र पर पहुंचाया। पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर ने वैश्विक नेताओं के साथ झूले पर झूलते हुए छायाचित्र प्रसिद्ध नहीं किए। इस्लामाबाद की जनसंख्या बमुश्किल २५ लाख है, लेकिन इन घटनाओं के लिए वहां की सरकार ने शहर पूर्णत: बंद रखा। हजारों सैनिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात किए। पाकिस्तान ने इन घटनाक्रमों का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए कर लिया। २१ घंटे की चर्चा के बाद भी सफल फॉर्मूला नहीं निकला, लेकिन चर्चा हुई यह महत्वपूर्ण है। अमेरिका को युद्ध से बाहर निकलना है। इजरायल की जनता युद्ध से थक चुकी है। ईरान का शासन और जनता आखिरी सांस तक पीछे हटने को तैयार नहीं है। ये तीनों इस्लामाबाद में एकत्र आए और बिना किसी निर्णय के लौट गए। फिर भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए।

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