मुख्यपृष्ठग्लैमरएक युग का अंत

एक युग का अंत

हिंदी सिनेमा ने आज अपना एक बड़ा सितारा खो दिया और इस अपूरणीय क्षति से एक युग का अंत हुआ। धर्मेंद्र, जिन्हें हम प्यार से धरम पाजी कहते थे, २४ नवंबर की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली और अब वे हमारे बीच नहीं रहे। ८९ वर्ष की उम्र में उनका निधन। लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे धर्मेंद्र को पहले १० नवंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन कुछ दिन बाद उनका परिवार उन्हें घर ले आया, जहां उनका इलाज चलता रहा।

स्कूल से निकलकर बारहवीं का एक छात्र जानी मानी अभिनेत्री सुरैया की फिल्म ‘दिल लगी’ देखने जाता है। देखते ही देखते उस छात्र को यह फिल्म इतनी अच्छी लगी कि उसने ४० बार वो फिल्म देख ली। यह बात १९४९ की है। फिल्म ने उस पर इतना जबरदस्त असर किया कि वो दिन-रात हीरो बनने का ख्वाब देखने लगा। एक दिन उसके पिता ने उसे डांट लगा दी। उसने साफ-साफ कह दिया कि उसका मन किताबों में नहीं लगता। अब उसका मन दूसरी ओर रम जाए तो उसके पिता ने उसकी शादी करवा दी। लेकिन उस पर तो जैसे हीरो बनने का खुमार चढ़ा हुआ था। एक दिन वह युवक जेब में सिर्फ इक्कावन रुपए लेकर आंखों में सुनहरे ख्वाब संजोकर पंजाब से मुंबई के लिए निकल पड़ा और वह युवक था बॉलीवुड का सबसे हैंडसम ही-मैन धर्मेंद्र। जिसका दिल हमेशा उनके गांव की हरियाली में रमता था और भोलापन उनकी आंखों में।

धर्मेंद्र की पहली सैलेरी
धर्मेंद्र को अपने करियर की पहली सैलरी पाने में इंतजार करना पड़ा। लगभग ६५ साल पहले, जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ साइन की, तो उन्हें पूरे प्रोजेक्ट के लिए केवल ५१ रुपये मिले। आज की नजर में यह राशि बहुत कम है, लेकिन उस समय यह उनके करियर की शुरुआत का अहम हिस्सा थी। यह फिल्म उनके लिए सफलता की नींव साबित हुई और
बॉलीवुड में उनके पांव जमाने का पहला कदम बनी।

१९६० में मिला फिल्मों में ब्रेक
धर्मेंद्र ने हीरो बनने का सपना लेकर छोटे से पंजाब के गांव से मुंबई की ओर कदम बढ़ाया। माया नगरी की चमक‑धमक के बीच, वह रोजाना स्टूडियो‑स्टूडियो के चक्कर काटता, फुटपाथ पर भूखा रहकर रातें गुजारता। एक दिन उसने शहर में आयोजित एक बड़े टैलेंट हंट के बारे में सुना। उत्साह से भरकर वह प्रतियोगिता में भाग लेता है और कुछ फिल्म निर्माताओं की नजर में आ जाता है। १९६० में उसे पहली बार फिल्मों में ब्रेक मिलता है। ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में छोटा रोल। निर्देशक ने उसकी सादगी और आंखों के भोलापन को सराहते हुए कहा, ‘तुम्हारा लुक और दिल, काम करेगा।’ इस फिल्म में वह ‘धरम सिंह’ के किरदार में दिखा और धीरे‑धीरे उसका नाम ‘धर्मेंद्र’ बन गया। एक के बाद एक फिल्में उसके हिस्से में आईं और वह लगातार काम करता रहा। देखते‑ही‑देखते वह बॉलीवुड का ‘ही‑मैन’ बन गया, जो अपने दम पर बड़े‑बड़े प्रोजेक्ट्स को संभालता रहा। आज धर्मेंद्र की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सपनों को सच करने के लिए कठिन रास्तों पर भी हार नहीं मानते। उनकी यात्रा यह सिखाती है कि संकल्प, मेहनत और अवसर का उपयोग किसी भी छोटे शहर के लड़के को सपनों की उड़ान में बदल सकता है।

‘ही‑मैन’ की प्रेम कहानी
धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की प्रेम कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी। दोनों की नजदीकियां फिल्मों में काम करते हुए बढ़ीं, लेकिन असली प्यार ‘शोले’ के सेट पर सामने आया। उस समय धर्मेंद्र पहले से ही शादीशुदा थे और चार बच्चों के पिता थे। उन्होंने हेमा से शादी करने के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार किया, लेकिन अपनी पहली पत्नी से तलाक नहीं लिया। हेमा मालिनी के परिवार को यह रिश्ता मंजूर नहीं था, क्योंकि वे फिल्म इंडस्ट्री के अन्य बड़े सितारों के साथ उनकी शादी चाहते थे। उस समय हेमा इंडस्ट्री की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक थीं और कई स्टार्स उनके प्यार में थे, जिनमें संजीव कुमार भी शामिल थे। बावजूद इसके, हेमा ने धर्मेंद्र के प्रति अपने प्यार के कारण अन्य प्रस्ताव ठुकरा दिए और दोनों ने साथ जीवन बिताने का फैसला किया।

आत्मा में बसता था पंजाब
धर्मेंद्र का जन्म ८ दिसंबर १९३५ को नसराली गांव, पंजाब में हुआ था और बाद में उनका परिवार साहनेवाल गांव में आकर बस गया। उनके पिता किशन सिंह देओल स्कूल के हेडमास्टर थे और मां सतवंत कौर घर संभालती थीं। धर्मेंद्र ने अपना बचपन, पढ़ाई और परिवार के साथ पंजाब में बिताया। उनका पंजाब से गहरा लगाव था और वे हमेशा कहते थे कि उनकी आत्मा में पंजाब बसता है। बॉलीवुड में उनकी छवि और योगदान हमेशा याद किए जाएंगे।

धर्मेंद्र का लकी शर्ट
धर्मेंद्र ने अपने करियर में कई बॉलीवुड एक्ट्रेसेस के साथ रोमांस किया और उनकी रोमांटिक फिल्मों ने दर्शकों को हमेशा मोहित किया। १९६० में ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से उनका डेब्यू हुआ, जो फ्लॉप रही, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ‘फूल और पत्थर’, ‘शोले’, ‘आंखें’ और ‘कर्तव्य’ जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाई। ७० और ८० के दशक को बॉलीवुड का गोल्डन टाइम माना जाता है और धर्मेंद्र उस दौर के सबसे लोकप्रिय ही-मैन में से एक थे। धर्मेंद्र के लिए एक यलो स्ट्रिप शर्ट भी खास रहाr, जिसे उन्होंने १९६८-७० के बीच तीन बड़ी फिल्मों जैसे ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’, ‘आया सावन झूमकर’ और ‘जीवन मृत्यु’ में पहना। यह शर्ट उनके लिए काफी लकी साबित हुई। इनमें से कई रोमांटिक गीतों में उन्होंने अपनी हीरोइनों जैसे राखी, आशा पारेख और शर्मिला टैगोर के साथ रोमांस किया, जो दर्शकों को बेहद पसंद आया।

अन्य समाचार