रविवार की सुबह जब ज्यादातर यात्री नींद में थे, तब त्रिवेंद्रम से हजरत निजामुद्दीन जा रही राजधानी एक्सप्रेस अचानक दहशत की पटरी पर दौड़ने लगी। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में लूणी रिच्छा और विक्रमगढ़ आलोट स्टेशन के बीच ट्रेन के बी-१ एसी कोच से धुआं उठने लगा और कुछ ही देर में आग ने भयावह रूप ले लिया। ट्रेन संख्या १२४३१ के इस कोच में ६८ यात्री सवार थे। गनीमत रही कि रेलवे स्टाफ और आरपीएफ ने तुरंत कार्रवाई करते हुए यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन हादसे ने रेलवे सुरक्षा की पुरानी कमजोरियों को फिर सामने ला दिया।
यह केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है। राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेन में एसी कोच में आग लगना बताता है कि रेलवे की सुरक्षा जांच, कोच मेंटेनेंस, वायरिंग, अग्निशमन उपकरणों और आपात प्रतिक्रिया व्यवस्था को लेकर गंभीर समीक्षा की जरूरत है। दुर्घटना के बाद रेल मार्ग प्रभावित हुआ और मुंबई-दिल्ली रूट पर ट्रैफिक रोका गया। जांच के बाद ही साफ होगा कि आग शॉर्टसर्किट, तकनीकी खराबी या किसी अन्य वजह से लगी। लेकिन यात्रियों के मन में सवाल वही है, क्या ट्रेन में सफर सचमुच सुरक्षित है?
भारत में रेल अग्निकांड नए नहीं हैं। जुलाई २०१२ में तमिलनाडु एक्सप्रेस में आग लगने से नेल्लोर के पास ४७ यात्रियों की मौत हुई थी। दिसंबर २०१३ में बेंगलुरु-नांदेड़ एक्सप्रेस के एसी कोच में आग ने २६ यात्रियों की जान ले ली थी। २०२३ में तेलंगाना में फलकनुमा एक्सप्रेस के तीन कोचों में आग लगी, हालांकि यात्रियों को बचा लिया गया। उसी वर्ष मदुरै स्टेशन पर खड़े कोच में आग लगने से नौ लोगों की मौत हुई थी; वहां निजी कोच में अवैध गैस सिलेंडर को कारण बताया गया था।
इन घटनाओं का साझा संदेश साफ है, रेलवे हादसे के बाद राहत और मुआवजे की परंपरा से आगे बढ़कर हादसा रोकने की संस्कृति विकसित करे। एसी कोचों की विद्युत जांच, फायर अलार्म, धुआं सेंसर, अग्निशमन सिलेंडर, स्टाफ प्रशिक्षण और यात्रियों की सुरक्षा जानकारी को औपचारिकता नहीं, अनिवार्य व्यवस्था बनाया जाना चाहिए। रतलाम के पास राजधानी एक्सप्रेस में ६८ यात्रियों का बच जाना राहत की खबर है, लेकिन यह राहत रेलवे को आत्मसंतोष में नहीं बदलनी चाहिए। क्योंकि इस बार लपटें थम गईं, मगर सवाल अब भी जल रहा है, रेलवे हर हादसे के बाद जागेगा या हादसे से पहले?
त्रिवेंद्रम-हजरत निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस के बी-१ एसी कोच में रतलाम के पास आग लगी।
कोच में सवार सभी ६८ यात्रियों को समय रहते सुरक्षित निकाला गया।
हादसे से मुंबई-दिल्ली रेल मार्ग पर ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई।
आग के कारणों की जांच शुरू, रेलवे सुरक्षा व्यवस्था पर फिर सवाल।
अतीत के मुख्य हादसे
जुलाई २०१२ में नेल्लोर के पास तमिलनाडु एक्सप्रेस में आग लगने से ४७ यात्रियों की मौत हुई थी, जिसने रेल अग्नि सुरक्षा की बड़ी खामियां उजागर की थीं।
दिसंबर २०१३ में बेंगलुरु-नांदेड़ एक्सप्रेस के एसी कोच में लगी आग में २६ यात्रियों की जान गई थी, फिर भी एसी डिब्बों की सुरक्षा पर सवाल बने रहे।
वर्ष २०२३ में फलकनुमा एक्सप्रेस और मदुरै स्टेशन पर खड़े कोच में आग की घटनाएं बताती हैं कि रेलवे को हादसे के बाद राहत नहीं, हादसे से पहले रोकथाम की मजबूत व्यवस्था बनानी होगी।
