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फोकस : नायर अस्पताल की बंद कैंटीन…

आदित्य जैन

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में अगर किसी को प्रशासनिक बेरहमी और संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण देखना हो, तो उसे सीधे नायर अस्पताल का रुख करना चाहिए। यहां पिछले आठ महीनों से वैंâटीन बंद है और यह कोई छोटी प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि बृहन्मुंबई महानगरपालिका की जनविरोधी कार्यशैली का खुला सबूत बन चुकी है। सवाल यह नहीं है कि वैंâटीन बंद क्यों है, सवाल यह है कि करोड़ों का बजट संभालने वाला बृहन्मुंबई महानगरपालिका का प्रशासन इतने महीनों से आंख मूंदकर बैठा क्यों है।

कथित तौर पर कैंटीन का ठेका खत्म हो गया, नया टेंडर समय पर नहीं निकाला गया, फाइलें दफ्तरों में धूल फांकती रहीं और नतीजा यह हुआ कि मरीजों और उनके परिजनों को भूखे-प्यासे अस्पताल में दिन-रात गुजारने पड़ रहे हैं। यह वही नायर अस्पताल है, जहां रोज हजारों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज इलाज के लिए आते हैं। इलाज तो किसी तरह मिल जाता है, लेकिन एक कप चाय, एक थाली सस्ता खाना उसके लिए उन्हें अस्पताल के बाहर भटकना पड़ता है। कई बार मरीज की हालत गंभीर होती है, परिजन बाहर जाने की हिम्मत नहीं कर पाते और घंटों भूखे बैठे रहते हैं। यह स्थिति किसी आपदा से कम नहीं है, लेकिन महानगर पालिका के लिए यह शायद ‘फाइल में लंबित मामला’ भर है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बदहाली की मार उन डॉक्टरों और नर्सों पर भी पड़ रही है, जो २४ से ३६ घंटे की लगातार ड्यूटी करते हैं। रात-रात भर ऑपरेशन, इमरजेंसी और मरीजों की जान बचाने के बाद उन्हें सुरक्षित और सस्ता भोजन तक नसीब नहीं होता। बाहर का महंगा और अस्वच्छ खाना ही उनका सहारा बन गया है। क्या यही है मुंबई की ‘विश्वस्तरीय’ स्वास्थ्य व्यवस्था?
आठ महीने तक कैंटीन बंद रहना कोई दुर्घटना नहीं, यह प्रशासन की सोची-समझी उदासीनता है। सवाल सीधा है-इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है? किस अधिकारी पर कार्रवाई हुई? किसने जवाबदेही तय की? जवाब शून्य है। महानगर पालिका को अगर अस्पतालों में इंसानों की जरूरतों से ज्यादा ठेकों और प्रक्रियाओं की फिक्र है, तो यह साफ है कि सिस्टम आम आदमी के खिलाफ खड़ा है। नायर अस्पताल की बंद वैंâटीन महज एक सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि यह उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जो जनता के पैसों पर चलकर भी जनता को भूखा छोड़ देती है।

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