अजय भट्टाचार्य
आईटी सेल के एसी कमरों में बैठकर हर आंदोलन में साजिश ढूंढ लेना, विधानसभा ने युवाओं को भाड़े के टट्टे (सही शब्द टट्टू), रीलबाज या पेड घोषित कर देना आसान है। हिम्मत का काम है बारिश में भीगकर, पुलिस के अवरोधकों के सामने खड़े होकर सत्ता से सवाल पूछना। हर आंदोलन को विदेशी हाथ, अर्बन गैंग, साजिश या पटकथा ड्रामा बताना मुद्दों से भागने का सबसे आसान तरीका है। सवालों का जवाब नहीं सूझे तो सवाल पूछने वालों के चरित्र पर हमला कर दो। यह पुराना फॉर्मूला है। जिस पीढ़ी को जहांपनाह दिन-रात रीलबाज कहकर हंसते रहे, वही पीढ़ी जब सड़क पर उतरी तो हजूर के पूरे प्रपंच/नरेटिव को हिलाकर साबित किया कि रील बनाना और रियल लड़ाई लड़ना, दोनों एक साथ भी हो सकते हैं। यहां तक कि जिल्ले इलाही दरबार-ए-खास से ही खिसक लिए!
काले अंग्रेजो भारत छोड़ो
१९४२ में अंग्रेजों ने कांग्रेस के पूरे नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें लगा कि बिना नेता के यह विद्रोह खत्म हो जाएगा, लेकिन आम भारतीयों ने मिलकर इसे गलत साबित कर दिया। आज वही ‘(काले) अंग्रेजों भारत छोड़ो’ वाली भावना जाग उठी है। अधिकार कभी दया से नहीं मिलते, उन्हें जागरूकता, एकता और साहस से हासिल किया जाता है। जो लोग अन्याय के सामने चुप रहते हैं, वे धीरे-धीरे अपनी ही आजादी खो देते हैं। सवाल उठाना अपराध नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज है और जब वह आवाज एकजुट होकर उठती है तो सबसे मजबूत सत्ता भी झुकने पर मजबूर हो जाती है। खामोशी नहीं, जागरूकता ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।
दफ्तर दौरा
गुजरात सचिवालय में एक नया चलन शुरू हुआ है, जिसमें मंत्री अपने विभागों के रोजमर्रा के कामकाज को बेहतर ढंग से समझने के लिए अचानक दौरा कर रहे हैं। पिछले हफ्ते, उच्च और तकनीकी शिक्षा राज्य मंत्री त्रिकम छंगा ने अपने विभाग का दौरा किया और कामकाज के बारे में सीधे जानकारी लेने के लिए सेक्रेटरी और स्टाफ से बातचीत की। इससे पहले, एक और युवा मंत्री ने भी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए अपने विभाग के स्टाफ के साथ काफी समय बिताया था। अधिकारी इस तरह के सीधे जुड़ाव का स्वागत करते हैं, लेकिन असली परीक्षा तो यह है कि क्या इन दौरों से कोई सार्थक सुधार होता है या नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
