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पूरे ब्रह्मांड में होती है देवी पूजा

 -भारत ही नहीं, विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में शक्ति, प्रकृति और मातृत्व के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना

शीतल अवस्थी

मां दुर्गा को आदिशक्ति कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और परिवर्तन के पीछे वही मूल ऊर्जा विद्यमान है। इसलिए देवी पूजा को केवल किसी एक प्रतिमा या क्षेत्र की आराधना नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त शक्ति के सम्मान के रूप में देखा जाता है।
भारतीय दर्शन में यह शक्ति कभी दुर्गा, कभी काली, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, अन्नपूर्णा और जगदंबा के रूप में पूजी जाती है। देवी के ये स्वरूप जीवन की अलग-अलग आवश्यकताओं और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्गा रक्षा और साहस, लक्ष्मी समृद्धि, सरस्वती ज्ञान, काली परिवर्तन और अन्नपूर्णा जीवन-पोषण की प्रतीक हैं।
प्रकृति के प्रत्येक अंश में शक्ति
सूर्य का प्रकाश, पृथ्वी की उर्वरता, नदियों का प्रवाह, वायु की गति और बीज से वृक्ष बनने की क्षमता—इन सभी को शक्ति की अभिव्यक्ति माना गया है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नदियों को माता, पृथ्वी को देवी और अन्न को अन्नपूर्णा कहा गया।
देवी माहात्म्य की प्रसिद्ध स्तुति इस व्यापक शक्ति को प्रणाम करती है-
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थात जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
विश्व की सभ्यताओं में मातृशक्ति
दुनिया की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में भी मातृदेवी अथवा प्रकृति-देवी की उपासना के प्रमाण मिलते हैं। मिस्र में आइसिस, यूनान में गैया और डेमीटर तथा रोमन परंपरा में सेरेस को मातृत्व, पृथ्वी और उर्वरता से जोड़कर देखा गया। इनके धार्मिक संदर्भ भारतीय देवी परंपरा से अलग हैं, लेकिन प्रकृति और मातृशक्ति के सम्मान का भाव समान दिखाई देता है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भी देवी के स्वरूप और नाम बदल जाते हैं। बंगाल में दुर्गा और काली, महाराष्ट्र में भवानी और महालक्ष्मी, गुजरात में अंबा, असम में कामाख्या, जम्मू में वैष्णो देवी तथा हिमाचल में ज्वाला देवी के रूप में शक्ति की आराधना होती है।
नवरात्रि-आंतरिक शक्ति की साधना
नवरात्रि के नौ दिनों में नवदुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इसका आध्यात्मिक अर्थ मनुष्य के भीतर मौजूद भय, क्रोध, अहंकार और अज्ञान पर विजय प्राप्त करना है। देवी की आराधना व्यक्ति को साहस, संयम, विवेक और करुणा विकसित करने की प्रेरणा देती है।
पूरे ब्रह्मांड में देवी पूजा का भाव यही बताता है कि शक्ति मंदिर की प्रतिमा तक सीमित नहीं है। वह प्रकृति, ज्ञान, मातृत्व, श्रम और प्रत्येक जीव की चेतना में विद्यमान है। देवी की वास्तविक उपासना तभी पूर्ण मानी जा सकती है, जब समाज महिलाओं का सम्मान करे, बेटियों को समान अवसर दे और प्रकृति की रक्षा करे।

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