राजन पारकर
महाराष्ट्र की धरती पर पहले डाकू जंगलों से निकलते थे; अब वे सीधे मोबाइल स्क्रीन से अवतरित होते हैं! नाम बड़े आधुनिक, पहनावा डिजिटल, भाषा चमकदार; लेकिन धंधा सीधा-सीधा गैरकानूनी! ओला, उबर और रैपिडो जैसी कंपनियों ने तकनीक के नाम पर परिवहन कानून की ऐसी धज्जियां उड़ाई हैं कि मानो शासन नहीं, बल्कि ऐप कंपनियों का निजी साम्राज्य चल रहा हो।
बिना वैध अनुमति, बिना सरकारी स्वीकृति, बिना आवश्यक नियमों के पालन के ये तथाकथित आधुनिक सेवाएं खुलेआम यात्रियों को ढो रही हैं यानी कानून की छाती पर बाइक दौड़ाकर मुनाफे का साम्राज्य खड़ा किया जा रहा है। मोटर वाहन अधिनियम एक तरफ पड़ा धूल खा रहा है और दूसरी तरफ डिजिटल दलाल जनता की सुरक्षा को दांव पर लगाकर करोड़ों का व्यापार कर रहे हैं।
न अनुमति, न जवाबदेही, लेकिन मुनाफा बेहिसाब!
इन सेवाओं की निर्लज्जता देखिए- न वैध परमिट, न सुरक्षा की गारंटी, न उचित बीमा, न महिलाओं की सुरक्षा का ठोस प्रबंध; फिर भी सेवा बड़े शान से जारी!
यह ऐसा ही है जैसे बिना विवाह के परिवार बसाना, बिना परीक्षा के डिग्री लेना और बिना कानून माने व्यापार करना! राहगीर किसके भरोसे बैठे? चालक कौन है? उसका आपराधिक रिकॉर्ड क्या है? दुर्घटना होने पर जिम्मेदार कौन?
इन सवालों का जवाब ढूंढना उतना ही कठिन है जितना रेगिस्तान में पानी तलाशना।
मुलुंड लिंक रोड पर हुई दर्दनाक दुर्घटना ने इस पूरी व्यवस्था का असली चेहरा उजागर कर दिया। एक महिला की मृत्यु हो गई, लेकिन इन डिजिटल मुनाफाखोरों के लिए वह सिर्फ एक और ‘इंसिडेंट रिपोर्ट’ बनकर रह गई। मानव जीवन सस्ता, कमीशन महंगा – यही इनकी असली व्यापार नीति है।
पहले डाकू कम से कम चेहरा दिखाते थे; आज के ये डिजिटल व्यापारी ‘यूजर प्रâेंडली इंटरफेस’ के पीछे छिपकर जनता की जान से खेल रहे हैं। एक लाइसेंसी ऑटोरिक्शा या टैक्सी चालक वर्षों तक परमिट, टैक्स, फिटनेस और सरकारी नियमों का चक्कर काटता है; जबकि दूसरी ओर कोई भी व्यक्ति मोबाइल ऐप डाउनलोड कर सीधे परिवहन व्यवसाय शुरू कर देता है! यह केवल अन्याय नहीं, बल्कि कानून का सार्वजनिक अपमान है। यदि यही व्यवस्था जारी रही, तो कल ईमानदारी से कर भरने वाले अपराधी कहलाएंगे और नियम तोड़ने वाले नवउद्यमी!
यदि अभी भी कार्रवाई नहीं हुई, तो इतिहास लिखेगा – ‘महाराष्ट्र में सरकार तो थी, लेकिन सत्ता ऐप के सर्वर पर चलती थी!’
