हनीफ जवेरी
काम अच्छा चलता है तो सभी को लगता है कि सब ठीक हो रहा है। मेहनत करके मन में खुशी भी होती है। लेकिन अचानक जब पता चलता है कि जो काम किया गया है वो गलत है, तब सारी मेहनत और खुशी पर पानी फिर जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ निर्माता एन.एन. सिप्पी के साथ, जब वे फिल्म ‘गुमनाम’ बना रहे थे।
हुआ यूं कि फिल्म ‘गुमनाम’ के लिए एक गाने की स्थिति बनाई गई, ताकि हास्य कलाकार महमूद पर वह गीत फिल्माया जा सके। गीतकार हसरत जयपुरी ने गीत लिखा, शंकर-जयकिशन ने संगीत दिया और मोहम्मद रफी की आवाज में वह गीत रिकॉर्ड भी हो गया। लेकिन जब गाना फिल्माने की बारी आई तो गाना सुनते ही महमूद ने मना कर दिया। उनका कहना था कि गीत में इस्लाम मजहब का पाक कलमा लिया गया है, इसलिए अगर यह गाना उन पर फिल्माया गया तो लोग न केवल उन्हें, बल्कि हसरत और रफी को भी जान से मार देंगे। यह सुनकर निर्माता एन.एन. सिप्पी हैरान रह गए क्योंकि उस जमाने में गाना रद्द करने का मतलब बीस हजार का बड़ा नुकसान था।
सिप्पी ने सोचा कि अगर गाना सच में विवादित होता तो रफी जैसे गायक उसे वैâसे गाते? क्या एक मुसलमान होने के नाते रफी और हसरत जैसे सुलझे हुए लोगों को पाक कलमा की अहमियत का अंदाजा नहीं था? जरूर महमूद बेवजह उन्हें डरा रहे हैं। खैर, वो यह अच्छी तरह जानते थे कि अगर महमूद को कोई समझा सकता है तो वो थीं उनकी साली मीना कुमारी। तय हुआ कि पहले रिकॉर्ड किया हुआ गाना मीना को सुनाया जाए। जब वह मंजूरी दे देंगी तो महमूद को गाना फिल्माने में कोई आपत्ति नहीं होगी। इसलिए मीना से बात कर उन्हें गाने की जानकारी दी गई और उनसे गीत सुनने का आग्रह किया गया। मीना खुद उर्दू की अच्छी शायरा थीं, इसलिए गाने के शब्दों का सही-गलत पहलू समझ सकती थीं। साथ ही एक मुसलमान होने के नाते वह यह भी बता सकती थीं कि क्या सच में हसरत और रफी ने यह गाना रिकॉर्ड कर कोई गलती की है।
खैर, एक शाम मीना अपनी फिल्म का ट्रायल शो देखने मुंबई के नोवेल्टी सिनेमा के ऊपर बने छोटे थिएटर में आर्इं, तो सिप्पी गाने का टेप लेकर वहीं पहुंच गए। मीना ने गीत ध्यान से सुना और सिप्पी से कहा कि महमूद सही हैं। यह सुनकर सिप्पी अचंभित रह गए। जब रफी को इस बारे में बताया गया तो उन्होंने भी स्वीकार किया कि इस गीत को स्वर देना उनकी बड़ी भूल थी। लेकिन हसरत नाराज हो गए और किसी की बात से सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि कलमा सही ढंग से पढ़ा गया है, इसलिए किसी मुसलमान के नाराज होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
मोहम्मद रफी को अपनी भूल पर इतना पश्चाताप हुआ कि वे जो पारिश्रमिक इस गीत के लिए लिया था उसे लौटाने के लिए तैयार हो गए। अंतत: बहुमत को देखते हुए शैलेंद्र से नया गीत लिखवाया गया- ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं…’ यह गीत रफी ने महमूद के साथ मिलकर बिना पारिश्रमिक लिए गाया और इस गीत ने इतिहास रच दिया, जबकि फिल्म के नायक मनोज कुमार ने इसे हटवाने की पूरी कोशिश की क्योंकि उन्हें भय था कि इस गीत से महमूद उनसे अधिक लोकप्रिय हो जाएंगे। ‘गुमनाम’ का गीत रद्द कर नया गीत रिकॉर्ड कराने का प्रसंग मुझे पहले महमूद ने तब सुनाया था जब मैं उनकी जीवनी ‘महमूद: ए मैन ऑफ मैनी मूड्स’ लिख रहा था। बाद में स्वयं फिल्म ‘गुमनाम’ के निर्माता एन.एन. सिप्पी ने भी यह घटना बताकर महमूद की बात की पुष्टि की थी।
