क्षिति अंबर थरथरा उठे जब रण में तू हुंकारे,
सिहर उठे रिपु रोम-रोम जब भारत-सुत ललकारे।
वीर तेरे रक्ताभ रुधिर से, शोणित देश की माटी,
तेरे लहू के रंग से रंगकर, बने शौर्य की थाती।
सीने में हो आग अगर तो खड्ग भी आग बरसती है,
मुट्ठी हो जो रण प्रतिज्ञ तो राह विजय की खुलती है।
हो मातृभूमि पर न्यौछावर इतिहास उसी की शान हैl
जो सदा रहे अमिताभ अमर, ऐसा उसका बलिदान हैl
जो तूफां से डरे नहीं, पर्वत झुकता जिसके आगे,
सच्चा वीर वही, जिसने रण में दुश्मन के सिर काटे।
चन्द्रहास चुप चले चपल तो नभ में भी चपला चमके,
ब्रह्मलोक से अहितल तक, जयघोष सदा उसका बरसे।
देखो-देखो मुक्त तिरंगा, लहराता विस्तृत नभ में,
ये शान महा रणशूरों की, अप्राण हुए भूरक्षण में।
भारत भू बलिदानों की, युद्धवीरों का देश महान,
जयति हिंद जय-जय भारत, रखना ऊंची इसकी शान।
-डॉ. कनक लता तिवारी
