-सलाइन से लेकर नेब्युलाइजर तक खरीदने पर मजबूर मरीज
-‘स्टॉक खत्म’ के बहाने ‘खूनी कमाई’
धीरेंद्र उपाध्याय
गरीबों का मंदिर कहा जानेवाला मुंबई मनपा का केईएम अस्पताल लूट की दुकान बन चुका है। यहां इलाज नहीं, ‘कमीशन इलाज’ का काला कारोबार चल रहा है। अस्पताल के वार्डों में मरीजों की तकलीफों से ज्यादा चर्चा अब कमीशन की होती है। हालात ऐसे हैं कि अस्पताल में मुफ्त मिलनेवाले सलाइन से लेकर नेब्युलाइजर तक खरीदने के लिए मरीजों को बाहरी मेडिकल दुकानों पर धकेला जा रहा है। स्टॉक खत्म, सप्लाई नहीं आई, फार्मेसी में अभी उपलब्ध नहीं जैसे बहानों के पीछे छिपी है वह सच्चाई, जिसमें गरीब मरीजों का दर्द, प्रशासन की चुप्पी और सिस्टम की सड़ांध साफ दिखती है। जनता के टैक्स से चलनेवाला अस्पताल ही अब मरीजों की जेब काटने का जरिया बन गया है। यहां मरीजों के साथ शोषण तंत्र अब खुलेआम हो रहा है। केईएम का यह मामला सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगा एक गहरा दाग है।
उल्लेखनीय है कि केईएम अस्पताल गरीबों और जरूरतमंदों के लिए आखिरी उम्मीद माना जाता है, वह अब गंभीर आरोपों की जद में है। कई मरीजों ने आरोप लगाया है कि अस्पताल में इलाज के नाम पर आर्थिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है। मरीजों को ऐसी बुनियादी चिकित्सा सामग्री के लिए भी बाहर की मेडिकल दुकानों पर भेजा जा रहा है, जो सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या न्यूनतम दरों पर मिलनी चाहिए। शिकायतों के अनुसार केईएम अस्पताल में मरीजों से सलाइन का सेट, थ्री-वे, कैयुला, नेब्युलाइजर मास्क, दवाइयां और रक्त जांच के लिए उपयोग होने वाले बल्ब तक बाहर से खरीदने के लिए कहा जा रहा है, यानी जो सामग्री अस्पताल को खुद मरीजों को उपलब्ध करानी चाहिए, उसका खर्च अब उन्हीं पर डाल दिया जा रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है, बल्कि यह संकेत भी देती है कि कहीं न कहीं ‘कमीशन सिस्टम’ की जड़ें गहराई तक फैली हुई हैं।
इलाज नहीं, ‘कमीशन’ का खेल
मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि अस्पताल के कुछ डॉक्टर या नर्स मरीजों को यह कहकर बाहर की दुकानों पर भेजते हैं कि अस्पताल का स्टॉक खत्म है। लेकिन जांच करने पर पता चलता है कि स्टॉक मौजूद होता है, पर मरीजों को जानबूझकर बाहर भेजा जाता है, ताकि बाहर की दुकानों से कमीशन का खेल जारी रहे। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि डॉक्टरों या उनके सहयोगियों द्वारा सुझाई गई दुकानों पर वही सामान कई गुना महंगे दामों पर बेचा जाता है। गरीब मरीज यह सोचकर खरीद लेते हैं कि डॉक्टर ने जो कहा वही सही होगा। इस तरह मरीजों को उनकी अज्ञानता और मजबूरी का फायदा उठाकर आर्थिक रूप से लूटा जा रहा है।
गरीब मरीजों के साथ अन्याय
केईएम अस्पताल में आने वाले अधिकांश मरीज गरीब या निम्न मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं। इनमें से कई लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं या रोज कमाकर पेट भरने वाले परिवारों से हैं। ऐसे लोग जब इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं, तो वे यह मानकर चलते हैं कि यहां उन्हें मुफ्त या रियायती इलाज मिलेगा। लेकिन जब इन्हीं मरीजों को २०० रुपए का आईवी सेट ५०० में और ५० रुपए का नेब्युलाइजर मास्क ३०० रुपए में खरीदने के लिए कहा जाता है, तो यह उनके लिए एक आर्थिक सदमा होता है। कई परिवारों को तो इलाज के खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ता है।
मानसिक शोषण भी कम नहीं
यह मामला सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि मानसिक शोषण का भी है। जब मरीज को यह कहा जाता है कि दवा लाओ, नहीं तो इलाज नहीं होगा, तो यह उसकी मानसिक स्थिति को और बिगाड़ देता है। कई मरीजों को यह महसूस कराया जाता है कि अगर वे बाहर से चीजें नहीं लाएंगे, तो उनका इलाज अधूरा रह जाएगा या डॉक्टर नाराज हो जाएंगे। यह डर, दबाव और असहायता का मिश्रण है, जो चिकित्सा सेवा की आत्मा के बिल्कुल विपरीत है।
