आज समस्या यह है कि छोटे कद के लोग बड़े पदों पर पहुंचकर पद की गरिमा नहीं संभाल पाते। मंत्री पद रौब दिखाने के लिए नहीं, जनसेवा और मर्यादा के लिए है। जिन्हें बड़ा पद मिला है, उन्हें अपना कद भी बड़ा करना चाहिए, कम-से-कम पद के अनुरूप व्यवहार तो करना ही चाहिए।
पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने मंत्रियों के काफिलों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अखबारों में खबर है कि कुछ मंत्री अपने काफिले आधे करेंगे, कोई दो गाड़ियां कम करेगा, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि वे सिर्फ शासनादेश में निर्धारित सुरक्षा और वाहन ही इस्तेमाल करेंगे। सवाल यह है कि अब तक इतने बड़े काफिले आते कहां से थे? क्या विभागों पर दबाव डालकर गाड़ियां और डीजल लिया जाता था?
नियम स्पष्ट है कि सरकारी वाहन उसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होगा, जिसके लिए वह स्वीकृत है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मंत्री को एक एस्कॉर्ट अनुमन्य है। यानी काफिले में मंत्री की सरकारी गाड़ी और एस्कॉर्ट, कुल दो वाहन होने चाहिए। विभागीय वाहनों का निजी या राजनीतिक प्रभाव दिखाने के लिए उपयोग सत्ता का दुरुपयोग है। सुलखान सिंह अपने अनुभवों से बताते हैं कि नब्बे के दशक तक मंत्रियों को नियमित एस्कॉर्ट भी अनुमन्य नहीं था। मेरठ और पीलीभीत में उन्होंने नियमों के आधार पर कई बार मंत्रियों की अनुचित मांगें नहीं मानीं। नाराजगी हुई, शिकायतें भी हुईं, लेकिन नियम नहीं बदले। वे यह भी बताते हैं कि कल्याण सिंह जैसे बड़े नेता असहमति को व्यक्तिगत विरोध नहीं मानते थे। वे व्यक्ति का मूल्यांकन गुण-दोष के आधार पर करते थे।
