सूफी खान
इस्लाम धर्म में १३ तकबीर वाली नमाज किसी खास मकसद के लिए पढ़ी जाती है और सऊदी अरब में वो हालात बन गए हैं, जिसके लिए इस नमाज का हुक्म दे दिया गया है। इसे सलात अल इस्तिस्का कहा जाता है। अरबी में सलात के मायने नमाज है। दक्षिण एशियाई मुल्कों में सलात को नमाज कहा जाता है और सोम को रोजा।
वहीं इस्तिस्का का अर्थ है बारिश के लिए प्रार्थना या अल्लाह की इबादत। इस्लामिक किंगडम ऑफ सऊदी अरब के रॉयल कोर्ट के बयान के मुताबिक, सऊदी के किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज ने १२ नवंबर को पूरे देश में विशेष नमाज सलातुल इस्तिस्का अदा करने का हुक्म दिया था।
सऊदी के बादशाह का ये हुक्म ऐसे समय में आया है जब किंगडम के कई हिस्सों में लंबे सूखे और अनियमित बारिश के हालात बने हुए हैं। सऊदी क्लाइमेट स्टडी के मुताबिक, पिछले कुछ बरसों में बारिश के मौसमों के बीच गैप बढ़ गया है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन की चिंता बढ़ी है। ऐसे में पर्यावरणविद और वैज्ञानिक तो इस पर काम कर ही रहे हैं। लेकिन प्रकृति को चलाने वाले खुदा से दुआ मांगने का ये तरीका सऊदी और मुस्लिम दुनिया में १,५०० साल पुराना है। कहा जाता है कि पैगंबर भी इस तरह से बारिश के लिए अल्लाह की बारगाह में गिड़गिड़ाकर दुआ करते थे।
सऊदी में इस्तिस्का की नमाज को सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति जागरूकता और लोगों को एक साथ लाने का तरीका माना जाता है। १२ नवंबर को ये खास नमाज पूरे सऊदी अरब में एक साथ अदा की गई। इतना ही नहीं, कतर में में इस्तिस्का की नमाज पढ़ाई गई, जिसमें अल्लाह से रहमत और बारिश की दुआ की गई। साथ ही नमाजियों से तौबा, इस्तिगफार या पापों से प्रायश्चित, नेकी यानी पुण्य कर्म करने और अल्लाह की ओर रुख करने की अपील की गई है।
इस्तिस्का की नमाज इस्लाम में एक खास मकाम रखती है। इसे बड़ी तादाद में लोग एक साथ अदा करते हैं। पूरे देश में ये एक साथ शाही हुक्म के तहत अदा किया गया। इसे तब अदा किया जाता है जब किसी इलाके में लंबे समय तक बारिश नहीं होती या सूखा पड़ता है। यह न केवल बारिश की दुआ है, बल्कि इंसान को अल्लाह के सामने विनम्रता और कृतज्ञता दिखाने का भी प्रतीक है। सऊदी अरब जैसे रेगिस्तानी देश में इसका धार्मिक और सामाजिक महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि एक साथ नमाज अदा कर एक ही मकसद के लिए दुआ की जाए तो अल्लाह इसे खाली नहीं जाने देता और सूखी धरती फिर से हरी हो जाती है। चूंकि इस्लाम में धार्मिक अनुशासन और नियम स्पष्ट और निश्चित हैं इसलिए भी इस तरह की इबादतें एक साथ एक ही समय पर मुमकिन हो पाती हैं।
