राजन पारकर
स्थान: आदि और समानता के नाम पर चलने वाला एक राजनीतिक मंडल।
`राज्य महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों का किला है, पर अब वह नेताओं के रंगे हुए तलाब में लोटने वाला मेंढक बन चुका है।’
आज जब कोई `महिला आयोग’ कहता है तो दिमाग में `निष्पक्षता’, `न्याय’, और `संवेदनशीलता’ जैसे शब्द गूंजते हैं।
पर महाराष्ट्र का महिला आयोग अब एक बंगले की लॉन पार्टी में सेल्फी लेती हुई ताई जैसा हो गया है, जिसकी सारी गंभीरता इंस्टाग्राम के फिल्टर में खो चुकी है।
अब देखिए, करुणा शर्मा नाम की महिला ने साफ आरोप लगाया है, `राजनीतिक रसूखदारों से जुड़ी शिकायतों पर महिला आयोग कोई कार्रवाई ही नहीं करता।’
अब आयोग की कुर्सी पर जो बैठी हैं वो खुद किसी पार्टी की ‘लाडली बेटी’ हों तो जब शिकायत ‘भाई के दोस्त’ के खिलाफ हो तो वो क्या `कड़क पैâसला’ सुनाएंगी?
शायद यही, `भिजवा दो गुलाब का फूल और एक माफीनामा।’
आयोग-अब झंडे से लिपटा हुआ रूमाल
रुपाली चाकणकर पर गंभीर आरोप हैं, लेकिन आत्मविश्वास ऐसा, जैसे वो रानी लक्ष्मीबाई की परपोती हों।
अरे भैया, महिला आयोग एक संवैधानिक संस्था है। ये कोई महिला विकास मंडल नहीं जहां चाय-बिस्कुट पर रिश्तेदारों का सम्मान हो।
आज आयोग का ‘विकास’ सिर्फ नेताओं की बहन-भांजियों को मंच देने में हो रहा है।
विपक्ष से आवाज आती है-
`महिला आयोग पर कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति बैठना चाहिए।’ -संजय राऊत
महिला आयोग बना ‘राजनीति की टेबल लैंप’
राज्य सरकार के मंत्रिमंडल की गहराई में जाइए तो पता चलता है कि किसका मामा, किसकी मामी, किसके दोस्त की वाइफ, सब कहीं न कहीं कमेटी में फिट हैं।
ऐसे में महिला आयोग, एक स्वतंत्र न्यायिक मंच कम और नेताओं के रिश्तेदारों का क्लब हाउस ज्यादा लगता है।
करुणा शर्मा कहती हैं-
`मैं खुद पार्टीबाज फैसलों की शिकार बनी हूं!’
अब भाभीजी, जहां न्याय सिर्फ बैनर पे लिखा हो और असल में हर शिकायत `टी-पार्टी की चुस्की’ में घुल जाए, वहां इंसाफ की उम्मीद कौन करे?
महिलाओं के लिए नया आयोग!
पंकजा मुंडेजी तो एक कदम आगे निकल गईं-
`एक नया आयोग बनाइए और जिम्मेदारी मुझे दीजिए।’
अरे ये तो `मैं ही राम, मैं ही हनुमान’ वाला मामला हो गया।
सत्ता की कुर्सी पर नया खूंटा और नया कुत्ता बसाने की तैयारी?
क्या यही है `महिला अधिकारों का पुनर्जन्म?’
आयोग की `आरोपवली’ का पुतला?
आज महिला आयोग एक `राजनीतिक स्टूडियो फोटो’ बनकर रह गया है।
किसी भी महिला की शिकायत पर सबसे पहले पूछा जाता है-
वो किसकी है?
उसका राजनीतिक कनेक्शन क्या है?
नेता कितना बड़ा है?
और फिर शिकायत का `रावण दहन’ कर दिया जाता है-
बिना आवाज, बिना कार्रवाई, सिर्फ खामोशी में।
आयोग नहीं, आरक्षण समिति?
राजनीति के दंगलबाजों ने `महिला आयोग’ को `महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि महिलाओं को संभालने की मशीन’ बना दिया है।
अगर यही हाल रहा तो आनेवाले वक्त में `राज्य महिला आयोग’ का नाम बदलकर `राजनीतिक महिला आरक्षण समिति’ रखने की सिफारिश करनी पड़ेगी।
