मुख्यपृष्ठधर्म विशेषआदिशक्ति की आराधना का अनन्य पर्व है नवरात्रि

आदिशक्ति की आराधना का अनन्य पर्व है नवरात्रि

– नौ रातों में शक्ति के नौ स्वरूपों का पूजन; साधना, संयम और आत्मविजय का महोत्सव

शीतल अवस्थी

नवरात्रि आदिशक्ति की आराधना का विशिष्ट पर्व है। ‘नवरात्रि’ का अर्थ है-नौ विशेष रातें। इन नौ दिनों और रातों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की क्रमशः पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में की गई उपासना, मंत्र-जप, व्रत और दान सामान्य दिनों की तुलना में अधिक फलदायी होते हैं।
भारतीय परंपरा में वर्ष में चार नवरात्रियां मानी गई हैं-चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ। इनमें चैत्र और आश्विन नवरात्रि व्यापक रूप से मनाई जाती हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।
घटस्थापना से आरंभ होती है साधना
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है। मिट्टी के पात्र में जौ बोकर उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाकर नारियल रखा जाता है। कलश को सृष्टि, समृद्धि और जीवन-ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
अखंड दीप प्रज्वलित करने की भी परंपरा है। दीपक साधक के भीतर ज्ञान, चेतना और आशा का प्रकाश बनाए रखने का संदेश देता है।
नौ दिनों में नवदुर्गा का पूजन
नवरात्रि में क्रमशः इन नौ स्वरूपों की पूजा होती है—
1. शैलपुत्री
2. ब्रह्मचारिणी
3. चंद्रघंटा
4. कूष्मांडा
5. स्कंदमाता
6. कात्यायनी
7. कालरात्रि
8. महागौरी
9. सिद्धिदात्री
ये स्वरूप स्थिरता, तप, साहस, सृजन, मातृत्व, न्याय, निर्भयता, पवित्रता और सिद्धि जैसे गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
तीन महाशक्तियों की उपासना
नवरात्रि के पहले तीन दिन मां दुर्गा अथवा महाकाली, अगले तीन दिन महालक्ष्मी और अंतिम तीन दिन महासरस्वती की आराधना से जोड़े जाते हैं। इसका संकेत है कि मनुष्य पहले अपने भीतर की नकारात्मकता का नाश करे, फिर सद्गुण और समृद्धि अर्जित करे तथा अंत में ज्ञान प्राप्त करे।
कन्या पूजन का महत्व
अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन किया जाता है। नौ कन्याओं को नवदुर्गा का प्रतीक मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और भोजन कराया जाता है। उन्हें वस्त्र, फल या दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
कन्या पूजन की सार्थकता तभी है जब समाज बेटियों को शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर प्रदान करे।
साधना और संयम का पर्व
नवरात्रि में सात्त्विक भोजन, स्वच्छता, नियमित पूजा, मंत्र-जप और संयम का पालन किया जाता है। व्रत का अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, असत्य और बुरी आदतों पर नियंत्रण करना भी है।
आदिशक्ति की उपासना मनुष्य को यह विश्वास देती है कि शक्ति उसके बाहर ही नहीं, भीतर भी विद्यमान है। उस आंतरिक शक्ति को जागृत कर भय, अज्ञान और अन्याय पर विजय प्राप्त करना ही नवरात्रि की वास्तविक साधना है।

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