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तीर्थस्थल पर पितरों के लिए जल-तर्पण

-नदी अथवा पवित्र जलाशय के तट पर तीन अंजलि जल अर्पित करने की परंपरा; श्रद्धा, शुद्धता और पर्यावरण का रखें ध्यान
सनातन धर्म में तीर्थयात्रा के दौरान देवदर्शन के साथ पूर्वजों का स्मरण और जल-तर्पण करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि पवित्र नदी या जलाशय के तट पर श्रद्धापूर्वक अर्पित जल पितरों को तृप्ति देता है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

गया, प्रयागराज, हरिद्वार, काशी, नासिक, उज्जैन और सिद्धपुर जैसे तीर्थ पिंडदान एवं पितृकर्म के लिए विशेष माने जाते हैं। हालांकि सरल जल-तर्पण किसी स्वच्छ नदी, सरोवर या घर पर भी किया जा सकता है।
 तर्पण की सामान्य विधि
स्नान करके स्वच्छ और सादे वस्त्र धारण करें। जलाशय के सुरक्षित किनारे पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें अथवा खड़े हों। हाथ में कुश और काले तिल लेकर अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का स्मरण करें।

दोनों हथेलियों में स्वच्छ जल लेकर उसमें कुछ काले तिल डालें। पितृतीर्थ—अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग—से धीरे-धीरे जल नीचे छोड़ें। सामान्यतः तीन अंजलि जल अर्पित करने की परंपरा है।
तर्पण करते समय बोलें—
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥
नाम और गोत्र ज्ञात हो तो उनका उच्चारण करते हुए अलग-अलग तर्पण किया जा सकता है। जानकारी न हो तो अपने कुल के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का सामूहिक स्मरण करें।
 करें यह प्रार्थना
हे हमारे पूर्वजों! श्रद्धापूर्वक अर्पित यह जल स्वीकार करें। हमारे परिवार को सद्बुद्धि, एकता, स्वास्थ्य और धर्म के मार्ग पर चलने का आशीर्वाद दें।ङ्ग
तर्पण के बाद सूर्यदेव, भगवान विष्णु और तीर्थ के अधिष्ठाता देवता को प्रणाम करें। संभव हो तो जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र अथवा दक्षिणा दें।
सुरक्षा और पर्यावरण
तेज बहाव अथवा गहरे पानी में प्रवेश न करें।
-प्रशासन द्वारा निर्धारित घाट और सुरक्षित स्थान का उपयोग करें।
-प्लास्टिक, कपड़ा, राख, फूलमाला या भोजन जल में न फेंकें।
– तर्पण के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में प्राकृतिक सामग्री पर्याप्त है।
– साबुन या रासायनिक पदार्थों से नदी में स्नान न करें।
– विशिष्ट पिंडदान या कर्मकांड के लिए योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लें।
तीर्थ पर तर्पण का मूल भाव अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता है। जल जीवन और पीढ़ियों की निरंतरता का प्रतीक है। इसलिए पितरों को जल अर्पित करते समय नदियों और जलाशयों को स्वच्छ रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य है।

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