सगीर अंसारी
महाराष्ट्र में नगरपालिका, नगर पंचायत और नगर परिषद चुनावों में ‘निर्विरोध’ चुन आने की लहर चल रही है। भाजपा अपने लोगों को निर्विरोध निर्वाचित कराने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का पूरा उपयोग कर रही है। भाजपा की सहयोगी पार्टियां भी उसी राह पर अग्रसर हैं। कुल मिलाकर यह चुनाव, चुनाव नहीं बल्कि बेईमानी है एक बड़ा घोटाला है। ऐसे में इन चुनावों का क्या मतलब रह जाता है? ऐसा क्यों हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
सबकी जिम्मेदारी
हम किसी व्यक्ति या दल को निशाना नहीं बना रहे हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि चुनाव भय, दबाव या सौदेबाजी से नहीं, जनता की इच्छा से होने चाहिए। निर्विरोध जीतें लोकतंत्र को कमजोर करती हैं और जनता की भूमिका को खत्म करती हैं। आइए, सभी मिलकर आवाज उठाएं कि हर सीट पर खुला मुकाबला, पारदर्शी प्रक्रिया और वास्तविक चुनाव हों। हम मांग करते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निर्विरोध चुनावों की स्वतंत्र जांच हो, उम्मीदवारों को सुरक्षा मिले और जनता को वास्तविक मतदान का अधिकार वापस दिया जाए। लोकतंत्र को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
नूर शेख
लोकतंत्र की रक्षा
चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए और स्वतंत्र रूप से मॉनिटर किया जाए। संभावित उम्मीदवारों को आवश्यक सुरक्षा, कानूनी सहायता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाए। किसी भी क्षेत्र में यदि निर्विरोध चुनाव होता है तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच अनिवार्य रूप से कराई जाए। लोकतंत्र का निर्माण केवल मतदान से नहीं होता, बल्कि भरोसे, भागीदारी और बराबरी से होता है। जब जनता यह महसूस करती है कि उसकी आवाज वास्तव में मायने रखती है, तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होती है और समाज एक अधिक न्यायपूर्ण दिशा की ओर बढ़ता है। हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि लोकतंत्र की इस आत्मा की रक्षा करें और यह सुनिश्चित करें कि हर चुनाव जनता की स्वतंत्र इच्छा का प्रतिबिंब बने। -मुर्गेश चटिरियान वन्निर पडियाची
उम्मीदवार दबाव में
निर्विरोध जीतें बहुतों के लिए सामान्य लग सकती हैं, परंतु इनके पीछे छिपी संरचनात्मक चुनौतियां गहरी होती हैं। जब किसी क्षेत्र में कोई मुकाबला ही नहीं होता तो यह संकेत देता है कि शायद संभावित उम्मीदवार दबाव में हों, स्थानीय राजनीतिक वातावरण में भय का प्रभाव हो। संसाधनों की असमानता हो या किसी तरह की अंदरूनी समझौता राजनीति चल रही हो। इस तरह की परिस्थितियां जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने के संविधानसम्मत अधिकार से दूर कर देती हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं।
महफूज आजमी (समाजसेवी)
