के.पी. मलिक
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में समय-समय पर ऐसे जनआंदोलन हुए हैं, जिन्होंने सिर्फ तत्कालीन सरकारों को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि राजनीति की दिशा भी बदल दी। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल विरोध, अन्ना आंदोलन और किसान आंदोलन तक, हर दौर ने यह साबित किया कि लोकतंत्र में जनता की संगठित आवाज सत्ता के लिए सबसे बड़ी कसौटी होती है। अब एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या जेन-जी ने भारतीय राजनीति में उसी तरह का एक नया अध्याय खोल दिया है?
सबसे बड़ी परीक्षा
दरअसल, लंबे समय तक यह धारणा बनाई गई थी कि आज की युवा पीढ़ी केवल मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया और रील्स की दुनिया तक सीमित है। कहा गया कि यह पीढ़ी विचारधारा से नहीं, ट्रेंड से चलती है और सड़क पर उतरकर संघर्ष करने की क्षमता खो चुकी है। लेकिन हाल के छात्र आंदोलन ने इस धारणा को गंभीर चुनौती दी। बड़ी संख्या में युवाओं ने अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और जवाबदेही के प्रश्नों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसके समर्थकों के अनुसार, इसकी ताकत हिंसा नहीं, बल्कि संगठन, धैर्य, निरंतरता और सार्वजनिक भागीदारी थी।
लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं बल्कि असहमति को सुनने की क्षमता होती है। जब नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखते हैं, तब सरकार के सामने केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं होता बल्कि राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही का भी सवाल खड़ा होता है। यही कारण है कि इस आंदोलन के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम पर व्यापक चर्चा हुई। विशेष रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर अनेक राजनीतिक विश्लेषण सामने आए। कुछ लोगों ने इसे जनदबाव का परिणाम माना, जबकि अन्य ने इसे सरकार का स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय बताया। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक तथ्य स्पष्ट है कि इस घटनाक्रम ने जवाबदेही और सत्ता की संवेदनशीलता पर राष्ट्रीय बहस को फिर से जीवित कर दिया।
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दो बड़े जनआंदोलन हुए। एक किसान आंदोलन और दूसरा छात्र आंदोलन, जो कई मायनों में अलग हैं। लेकिन दोनों ने एक समान संदेश दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संगठित, शांतिपूर्ण और लंबे समय तक चलने वाला जनदबाव राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। किसान आंदोलन के बाद कृषि कानून वापस लिए गए। छात्र आंदोलन के बाद शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही पर बहस तेज हुई। इन घटनाओं को एक-दूसरे का प्रतिरूप मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यह कहना भी कठिन है कि इनका राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
सत्ता की जवाबदेही!
यह आंदोलन सिर्फ शिक्षा तक सीमित दिखाई नहीं देता। इसके पीछे युवाओं की व्यापक चिंताएं भी झलकती हैं जैसे रोजगार, अवसरों की कमी, संस्थाओं पर विश्वास, पारदर्शिता और भविष्य की अनिश्चितता। यही कारण है कि इसे केवल एक छात्र आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की राजनीतिक चेतना के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। यह पीढ़ी सिर्फ चुनाव में वोट डालने तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि नीतियों, निर्णयों और सत्ता की जवाबदेही पर भी अपनी भूमिका चाहती है।
हालांकि, किसी भी लोकतंत्र में यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक घटनाओं के कारणों पर निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर निकाले जाएं। किसी मंत्री का इस्तीफा केवल एक कारण से हुआ, ऐसा मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि सरकारी निर्णय अनेक प्रशासनिक और राजनीतिक कारकों से प्रभावित होते हैं। फिर भी यदि किसी बड़े सार्वजनिक आंदोलन के समानांतर ऐसे महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय सामने आते हैं, तो उनका लोकतांत्रिक और राजनीतिक विश्लेषण स्वाभाविक है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया है। लोकतंत्र में सत्ता की वास्तविक ताकत केवल बहुमत नहीं होती बल्कि जनता का विश्वास होता है। जब नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से संगठित होकर अपनी बात रखते हैं तो किसी भी सरकार के लिए उन्हें पूरी तरह अनसुना करना आसान नहीं होता। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता भी है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।
नई पीढ़ी से सीख
बहरहाल, अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि एक आंदोलन सफल हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत की नई पीढ़ी लोकतंत्र में अपनी भूमिका को नए तरीके से परिभाषित कर रही है? क्या जेन-जी सिर्फ डिजिटल दुनिया की पीढ़ी नहीं बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों की नई आवाज बनकर उभर रही है? और क्या आने वाले वर्षों में सरकारों को केवल चुनावी जीत ही नहीं बल्कि नागरिकों की लगातार बढ़ती लोकतांत्रिक अपेक्षाओं का भी सामना करना पड़ेगा? इन तमाम सवालों के जवाब तो समय देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारतीय लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी अब सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं रही। यदि यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति का सबसे प्रभावशाली परिवर्तन किसी राजनीतिक दल से नहीं बल्कि जागरूक, संगठित और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाली नई पीढ़ी से आ सकता है।
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)
