मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : लोकतंत्र के चौराहे पर खड़ा भारत!

पॉलिटिका : लोकतंत्र के चौराहे पर खड़ा भारत!

के.पी. मलिक

भारतीय लोकतंत्र इस समय ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां कई बड़े राष्ट्रीय मुद्दे एक साथ देश की राजनीति, शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की दिशा तय कर रहे हैं। संसद का मानसून सत्र केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन नीतिगत बहसों का भी मंच बन गया है, जिनका प्रभाव आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। परिसीमन, एथेनॉल नीति, छात्रों का आंदोलन, सोनम वांगचुक का अनशन और राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका ये सभी विषय अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही सवाल मौजूद है कि क्या भारत में लोकतांत्रिक विमर्श अब नीतियों पर आधारित है या राजनीतिक नैरेटिव पर?
सबसे पहले बात परिसीमन की। संविधान के अनुसार, जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने के लिए बनाई गई थी। लंबे समय से यह प्रक्रिया स्थगित रही है और अब यह चर्चा तेज है कि भविष्य में परिसीमन से देश की चुनावी राजनीति में व्यापक बदलाव आ सकते हैं। यदि परिसीमन लागू होता है तो उत्तर भारत के कई राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है, जबकि दक्षिण भारत के वे राज्य जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर चिंता जता रहे हैं। यही कारण है कि यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और राहुल गांधी, इस मुद्दे पर पारदर्शिता और व्यापक सहमति की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि किसी भी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन संविधान के दायरे में ही होगा। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि परिसीमन होगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त राजनीतिक सहमति बनाई जाएगी। इसी दौरान इथेनॉल मिश्रण नीति को लेकर भी बहस तेज हुई है। सरकार का लक्ष्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, किसानों की आय बढ़ाना और स्वच्छ र्इंधन को बढ़ावा देना है। यह नीति ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन इसके साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं।
विभिन्न क्षेत्रों से इथेनॉल संयंत्रों के आस-पास प्रदूषण, जल उपयोग, कृषि भूमि पर प्रभाव और पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर विरोध की खबरें सामने आती रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि इथेनॉल उत्पादन का विस्तार वैज्ञानिक पर्यावरणीय मूल्यांकन, स्थानीय समुदायों की सहमति और पर्याप्त नियामकीय निगरानी के बिना होगा तो इससे दीर्घकालिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यहां मूल प्रश्न इथेनॉल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि नीति निर्माण की पारदर्शिता का है। क्या स्थानीय समुदायों को पर्याप्त जानकारी दी जा रही है? क्या पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र मूल्यांकन हो रहा है? और क्या किसानों, वैज्ञानिकों तथा नागरिक समाज की चिंताओं को नीति निर्माण में पर्याप्त स्थान मिल रहा है? किसी भी बड़ी राष्ट्रीय नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की विश्वसनीयता से तय होती है।
इसी क्रम में जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन और सोनम वांगचुक के अनशन ने भी सरकार के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। छात्रों का कहना है कि बार-बार होनेवाले पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था की कमियों ने उनके भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक का अनशन इस आंदोलन को व्यापक नैतिक समर्थन प्रदान करता दिखाई देता है। लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का समाधान संवाद से निकलता है। यदि लंबे समय तक आंदोलनकारी पक्ष और सरकार के बीच सार्थक बातचीत नहीं होती तो अविश्वास बढ़ता है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या सरकार को आंदोलनकारियों के साथ औपचारिक संवाद की पहल करनी चाहिए। संवाद का अर्थ हर मांग को स्वीकार करना नहीं होता, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करना होता है।
इस पूरे घटनाक्रम में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका को लेकर भी विपक्ष सवाल उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि छात्रों की प्रमुख मांगों पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई, जबकि सरकार का पक्ष है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इन दावों और प्रतिदावों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के युवाओं का शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास बना रहना चाहिए।
इसी दौरान एक और दिलचस्प राजनीतिक विमर्श सामने आया है राहुल गांधी की भूमिका को लेकर। अक्सर सार्वजनिक बहस इस प्रश्न पर केंद्रित हो जाती है कि राहुल गांधी किसी आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं या नहीं।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन मुद्दों पर आंदोलन हो रहे हैं, क्या उन पर पर्याप्त नीति-आधारित चर्चा हो रही है? विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं। इन मुद्दों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय नीति और तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए। यदि बहस केवल व्यक्तियों तक सीमित हो जाए और मूल समस्याएं पीछे छूट जाएं तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ता है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारियां स्पष्ट हैं। सरकार का दायित्व है कि वह नीतियों को पारदर्शी बनाए, आलोचनाओं का उत्तर दे और संवाद के रास्ते खुले रखे। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी केवल विरोध करना नहीं, बल्कि ठोस वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना भी है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब बहस व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि नीतियों पर केंद्रित होती है। दरअसल, आज देश जिन मुद्दों पर चर्चा कर रहा है परिसीमन, इथेनॉल, शिक्षा व्यवस्था, युवाओं का भविष्य और लोकतांत्रिक संवाद! वे आनेवाले वर्षों में भारत की दिशा तय करेंगे। इन विषयों को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति चुनावों से नहीं, बल्कि उन प्रश्नों से मापी जाती है जिन्हें पूछने की स्वतंत्रता समाज के पास होती है। यदि नीति संबंधी प्रश्नों का उत्तर तथ्यों, संवाद और पारदर्शिता से दिया जाएगा तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन यदि बहस केवल राजनीतिक नैरेटिव तक सीमित रह गई तो सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास का होगा। भारत आज केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर से नहीं गुजर रहा, बल्कि नीति, जवाबदेही और लोकतांत्रिक परिपक्वता की परीक्षा के दौर से भी गुजर रहा है। यही परीक्षा तय करेगी कि आनेवाले वर्षों में देश का लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा या केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार बनकर रह जाएगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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