के.पी. मलिक
मोदी-शाह की जोड़ी और संघ-भाजपा के रिश्तों में अब खींचतान और अविश्वास की बर्फ जमती हुई नजर आ रही है। सत्ता और संगठन के इस द्वंद्व में दोनों पक्ष अपनी-अपनी पकड़ मजबूत बनाने की जद्दोजहद में हैं, जहां संघ चाह रहा है कि पार्टी-संगठन में अपनी खोई हुई अहमियत को फिर से प्राप्त कर ले, वहीं मोदी-शाह अपने राजनीतिक प्रभुत्व को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहते हैं। वर्चस्व की इस लड़ाई में मोदी और शाह हमेशा संघ के ‘गाइडिंग’ रोल को व्यावहारिक राजनीति की जरूरतों के सामने गौण मानते रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, मोदी अपने विश्वासपात्र दत्तात्रेय होसबोले को संगठन में आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ हैं, ताकि भागवत के प्रभाव क्षेत्र को सीमित किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ मोहन भागवत संघ के अनुभवी चेहरों-संजय जोशी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री पद पर लाने की सोच रखते हैं, जिससे पार्टी पर नियंत्रण और ‘मूल’ विचारधारा का पुनर्प्रतिष्ठापन हो सके।
द्वंद्व!
जोशी और वसुंधरा के नामों पर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। जहां संजय जोशी के नाम पर मोदी अब भी असहज हैं, वहीं अमित शाह समझौते को तैयार दिखते हैं; यही वजह है कि संघ जोशी कार्ड को वक्त-वक्त पर आजमाता रहता है, जबकि वसुंधरा राजे के मुद्दे पर तस्वीर उलटी है: मोदी उनके प्रति कुछ लचीले, तो शाह पूरी तरह विरोधी दिखते हैं, यह दर्शाता है कि दोनों के हितों और समीकरणों में गहरी दरार है। याद कीजिए राजस्थान विधानसभा चुनावों में वैâसे चला था ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ वाला नारा भी इसी भीतरी राजनीति का ट्रायल-बैलून प्रतीत होता है।
अगर संघ-शाह के समीकरण की बात करें तो भागवत-अमित शाह के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण रहे हैं; शाह की स्टाइल संघ के अनुशासन और शाखा मॉडल से कदमताल करती हुई नजर नहीं आती। संघ आज जिस दोराहे पर खड़ा है, वहां पार्टी और सरकार दोनों पर असर डालने का उसका कौशल घट रहा है, ऐसे में शाह की राजनीतिक आक्रामकता संघ के लिए ‘लाल रेखा’ बन गई है। मोदी बनाम भागवत की ‘जंग’ दरअसल भाजपा के भविष्य, विचारधारा और नेतृत्व पर निर्णायक लड़ाई है। सत्ता के इन दो केंद्रों की रस्साकशी नए समीकरणों और अप्रत्याशित परिणामों की ओर संकेत कर रहे हैं, जिसका असर भाजपा ही नहीं, देश की राजनीति पर भी गहराई से पड़ना तय है।
बाजी!
बहरहाल, अब देखने की बात यही है कि बाजी किसके हाथ जाती है, संगठन की जड़ों वाले संघ या व्यक्तिवाद की राजनीति करने वाले मोदी-शाह के? कौन बनाएगा सत्ता और संगठन का असली संतुलन? संघ-भाजपा और मोदी-शाह के रिश्तों में दरार गहराती दिख रही है? जहां एक ओर मोदी-शाह जोड़ी सत्ता और संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है, वहीं संघ फिर से पार्टी-संगठन के ‘मूल’ निर्णायक बनने को बेचैन है। ऊपरी चमक-दमक के बावजूद आज दोराहे पर खड़ी भाजपा में संघ और सरकार के बीच अविश्वास, ध्रुवीकरण और नेतृत्व संघर्ष का युग शुरू हो चुका है।
दरअसल, यह शक्ति और संतुलन की जंग है, जहां मोदी दत्तात्रेय होसबोले के जरिए संगठन में अपनी आवाज प्रबल बना रहे हैं, वहीं संघ संजय जोशी और नितिन गडकरी को आगे कर पार्टी और सरकार पर अपनी प्राथमिकता बनाना चाहता है। हालिया बयान, पैâसलों और अंदरूनी चर्चाओं से साफ है कि मोदी–शाह का नेतृत्व अपनी-अपनी ताकत साधने में व्यस्त हैं, जहां संजय जोशी पर मोदी अब भी गरम तो शाह नरम, वहीं वसुंधरा के नाम पर शाह गरम और मोदी नरम दिखते हैं। विधानसभा चुनावों के चर्चित नारे ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ में भी संघ–पार्टी–सरकार के समीकरण बदलते दिख रहे हैं।
चाणक्य!
दरअसल, मोहन भागवत का झुकाव पुराने, जमीनी चेहरों की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह अमित शाह की व्यक्तिवादी शैली से टकरा रहा है। संघ के सूत्रों की मानें तो शाह की आक्रामकता और तेज-तर्रार संगठन निर्माण संघ की ‘धारा’ को बाधित करती है इसीलिए दोनों के बीच गहरे असहज संबंध उभर रहे हैं। ऐसे में भविष्य की दिशा और दशा क्या होगी? आज भाजपा में दो विचारधारावादी ध्रुव आमने-सामने हैं संघ आधारित संगठनात्मक संतुलन और मोदी-शाह की चुनाव केंद्रित करिश्माई नीति। यही रस्साकशी तय करेगी कि भाजपा का भविष्य किन मूल्यों, नेताओं और समीकरणों से तय होगा और कौन संघ-सरकार का असली ‘चाणक्य’ बनेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
