मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका :  ब्रिगेडियर पुरोहित की पदोन्नति का संदेश क्या है?

पॉलिटिका :  ब्रिगेडियर पुरोहित की पदोन्नति का संदेश क्या है?

के.पी. मलिक

भारतीय सेना में पदोन्नतियां आमतौर पर संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत होती हैं और शायद ही कभी व्यापक सार्वजनिक बहस का विषय बनती हैं। लेकिन कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को रिटायरमेंट से ठीक पहले ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत किए जाने ने इस सामान्य परंपरा को तोड़ दिया है। यह पैâसला अब केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि न्याय, संस्थागत आचरण और राजनीतिक संकेतों के जटिल सवालों के बीच खड़ा दिखाई देता है।
भरपाई!
गौरतलब है कि साल २००८ के मालेगांव विस्फोट मामले में आरोपी रहे पुरोहित को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत से बरी किया गया। अदालत का निष्कर्ष साफ था कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध नहीं कर सका और जांच में गंभीर खामियां थीं। ऐसे में यह तर्क मजबूत दिखता है कि एक अधिकारी, जिसे कानून ने निर्दोष माना, उसे उसके करियर में हुए नुकसान की भरपाई मिलनी चाहिए। इसी आधार पर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) का हस्तक्षेप और रिटायरमेंट पर रोक, तथा उसके बाद पदोन्नति पर विचार इन सबको एक न्यायिक प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति के रूप में देखा जा सकता है।
फिर भी इस पूरे घटनाक्रम की टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है। रिटायरमेंट से ठीक पहले पदोन्नति और वह भी तब जब अधिकारी सक्रिय कमान की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होगा, इस निर्णय को महज ‘करियर जस्टिस’ से आगे ले जाकर ‘प्रतीकात्मक कदम’ बना देती है। यह प्रतीकवाद ही है, जो इस पैâसले को विवाद के केंद्र में लाता है। समर्थकों के लिए यह निर्णय स्पष्ट रूप से न्याय की बहाली है कि एक ऐसे अधिकारी के साथ हुए अन्याय का सुधार, जिसका करियर १७ वर्षों तक एक अनिश्चित कानूनी प्रक्रिया में अटका रहा। उनके अनुसार, जब अदालत ने दोषमुक्त कर दिया तो राज्य और सेना का दायित्व बनता है कि वह न केवल आरोप हटाए, बल्कि खोए हुए अवसरों की भरपाई भी करे। इस दृष्टि से यह पदोन्नति संस्थान की निष्पक्षता और अपने कर्मियों के प्रति जिम्मेदारी का संकेत है।
संवेदनशील पहलू!
लेकिन आलोचकों की चिंता अलग है। उनका सवाल यह है कि क्या यह निर्णय केवल कानूनी दायित्व तक सीमित है या इसके जरिए एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक संदेश भी दिया जा रहा है? मालेगांव केस ने जिस तरह ‘आतंकवाद’ और ‘पहचान’ के सवालों को छुआ था, उसके बाद इस पदोन्नति को पूरी तरह उस संदर्भ से अलग करके देख पाना आसान नहीं है। ऐसे में यह आशंका भी उठती है कि कहीं यह पैâसला सेना की उस छवि को प्रभावित न करे, जो अब तक एक सख्ती से अपोलिटिकल और धर्मनिरपेक्ष संस्था के रूप में स्थापित रही है। यहीं पर इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू सामने आता है। भारतीय सेना की विश्वसनीयता केवल उसकी सैन्य क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत निष्पक्षता पर भी टिकी है। इसलिए हर ऐसा निर्णय, जो किसी विवादित पृष्ठभूमि से जुड़ा हो, स्वाभाविक रूप से गहरे विश्लेषण और सवालों को जन्म देता है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस पदोन्नति की तुलना फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जैसे ऐतिहासिक सैन्य सम्मान से करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है। मानेकशॉ का सम्मान असाधारण युद्ध नेतृत्व और ऐतिहासिक जीत का परिणाम था, जबकि पुरोहित का मामला एक कानूनी विवाद और उसके बाद की संस्थागत प्रतिक्रिया से जुड़ा है। दोनों की प्रकृति और संदर्भ पूरी तरह अलग हैं।
बहरहाल, ब्रिगेडियर पुरोहित की पदोन्नति को किसी एक नजरिए से समझना संभव नहीं है। यह न तो केवल एक साधारण प्रशासनिक निर्णय है और न ही पूरी तरह एक राजनीतिक संदेश। यह उन दुर्लभ घटनाओं में से एक है, जहां न्यायिक प्रक्रिया, संस्थागत जिम्मेदारी और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ एक-दूसरे में उलझ जाते हैं। शायद सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि यह पैâसला एक साथ कई परतों में काम करता है कि यह न्याय की बहाली भी है, एक अधिकारी के साथ हुए नुकसान की भरपाई भी और साथ ही एक ऐसा संकेत भी, जिसकी व्याख्या अलग-अलग नजरिए से की जाएगी। यही इसकी जटिलता है और यही इसे आज के भारत में संस्थानों की भूमिका पर गंभीर बहस का विषय बनाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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