तौसीफ कुरैशी
भारतीय राजनीति में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत केवल बहुमत नहीं होती, बल्कि यह विश्वास भी होता है कि विरोधी अंतत: बिखर जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में यही धारणा बार-बार दिखाई दी कि राजनीतिक दबाव, जांच एजेंसियों का भय या सत्ता के आकर्षण के आगे अधिकांश क्षेत्रीय दल झुक जाएंगे। लेकिन राजनीति का स्वभाव यह है कि वह हर बार एक जैसा परिणाम नहीं देती।
नई रणनीति गढने में जुटा विपक्ष
हाल के घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले विपक्ष अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ने में जुटा है। ऐसी चर्चाएं हैं कि सत्ता पक्ष को उम्मीद थी कि कुछ क्षेत्रीय दल उसके साथ आ जाएंगे और संवैधानिक संशोधनों सहित महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना आसान हो जाएगा। इसी संदर्भ में तमिलनाडु की राजनीति से आए संकेतों ने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान आकर्षित किया है। यदि द्रमुक (डीएमके) वास्तव में अपने सहयोगी दलों के साथ मजबूती से खड़ी रहती है और किसी संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण का हिस्सा नहीं बनती, तो सत्ता पक्ष की संसदीय रणनीति पर इसका असर पड़ सकता है।
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न
विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि विपक्ष की एकजुटता ही लोकतांत्रिक संतुलन की सबसे बड़ी गारंटी है। महिला आरक्षण, परिसीमन और संविधान से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष ने पहले भी सरकार को घेरने की कोशिश की है। सत्ता पक्ष के समर्थक इसे राजनीतिक विरोध मानते हैं, जबकि विपक्ष इसे संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न बताता है। यही टकराव आने वाले दिनों में और तीखा दिखाई दे सकता है।
अपनी जमीन मजबूत कर रहे दल
उत्तर प्रदेश की राजनीति भी इस राष्ट्रीय तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती दिख रही है। इधर दल-बदल, टूट-फूट और नए समीकरणों की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें हैं कि कुछ नेता सत्ता और विपक्ष दोनों से संपर्क बनाए हुए हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि हर दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगा है।
लोकतंत्र की असली खिलाड़ी जनता
संसद का मानसून सत्र केवल विधेयकों का सत्र नहीं होगा बल्कि यह राजनीतिक विश्वास, विपक्ष की एकजुटता और सरकार की संसदीय क्षमता की भी परीक्षा बनेगा। राजनीति की बिसात पर मोहरे चाहे जितनी तेजी से बदलें, लोकतंत्र का असली खिलाड़ी अंतत: जनता ही रहती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से अपने जन्म से ही पर्दे के पीछे से डील करते या कराते चले आ रहे क्षेत्रीय दल के सियासी प्रोफेसर की डील मुस्लिम सांसदों के बड़ी शिद्दत से किए गए विरोध के चलते परवान नहीं चढ़ी, बेचारे अमित शाह से डील कर आए थे।
जनता करेगी अंतिम फैसला
इसी बीच सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव भी राजनीति पर दिखाई देने लगा है। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन ने लोकतंत्र, संविधान और जनभागीदारी के सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। यदि जनता के बीच ऐसे मुद्दे लगातार प्रभावी बने रहे, तो उनका असर संसद के भीतर भी दिखाई दे सकता है। भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य यही है कि यहां अंतिम पैâसला सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता की अदालत में होता है।
