तौसीफ कुरैशी
मैं क्या चाहता हूं और क्या नहीं चाहता हूं, इसके कोई मायने नहीं। लोकतंत्र में असली मायने इस बात के हैं कि जनता क्या जानना चाहती है और सत्ता उसे कितना जानने देना चाहती है। इसलिए अस्सी प्रतिशत की इच्छा है कि ज्ञानेश कुमार गुप्ता इस्तीफा न दें। वे उसी कुर्सी पर बैठे रहें, जिस पर बैठकर वोट चोरी कर नफरती विचारधारा को जनता-जनार्दन के ना चाहने पर भी सत्ता सौंप दी, अब देश चुनाव आयोग से सवाल पूछ रहा है। क्योंकि ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफा हो गया तो आदमी चला जाएगा, लेकिन सवाल भी उसके साथ चला गया तो? अभी तो सवाल जिंदा है। अभी तो एसआईआर की फाइलें खुलनी हैं। अभी तो १३ करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर किए जाने का सवाल है। अभी तो यह पूछा जाना है कि जिनके नाम हटाए गए, उनमें से कितने वास्तविक मतदाता थे और कितनों को बाद में वापस जोड़ा जाएगा। अगर लाखों-करोड़ों नाम फिर जुड़ते हैं तो सवाल और बड़ा होगा जब नाम जोड़ने ही थे तो काटे क्यों थे? यही वह सवाल है जिससे पूरी कहानी की पटकथा बदल सकती है। इसीलिए ज्ञानेश कुमार गुप्ता का इस्तीफा इस समय किसी को बहुत राहत दे सकता है। असली चोर गया, विवाद गया, सुर्खियां गर्इं और कुछ दिन बाद देश को कोई नया राजनीतिक तमाशा मिल जाएगा।
लेकिन ज्ञानेश कुमार गुप्ता कुर्सी पर बने रहे तो हर दिन सवाल होगा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पूछेगी। पत्रकार पूछेंगे। वकील पूछेंगे। पूर्व चुनाव आयुक्त पूछेंगे। जंतर-मंतर पूछेगा। लोक लिहाज को सुप्रीम कोर्ट पूछेगा। और सबसे आखिर में वह आदमी पूछेगा जिसके हाथ में वोट है मेरा नाम क्यों काटा? यही तो लोकतंत्र है। वरना चुनाव आयोग को भी सरकारी दफ्तर समझ लीजिए फाइल आई, हस्ताक्षर हुए, आदमी बदला और कहानी खत्म। मगर चुनाव आयोग कोई साधारण दफ्तर नहीं है। यह उस गरीब आदमी की आखिरी उम्मीद है जिसके पास सत्ता के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए न पैसा है, न पालतू मीडिया, न कोई पुलिस मंत्रालय। उसके पास सिर्फ वोट है। इसलिए असली मुद्दा ज्ञानेश कुमार गुप्ता का रहना या जाना नहीं है। असली मुद्दा उस चुनावी मशीन का है, जिस पर सवाल उठ रहे हैं। मशीन खराब है तो ऑपरेटर बदल देने से मशीन ठीक नहीं होती। मशीन खोलनी पड़ती है। पुर्जे देखने पड़ते हैं। तारों का हिसाब लेना पड़ता है। यह पता लगाना पड़ता है कि खराबी कहां से आई और किसने उसे नजरअंदाज किया। आज यही होना चाहिए। और यह काम ज्ञानेश कुमार गुप्ता के इस्तीफे के बाद नहीं, उनके रहते होना चाहिए। उनसे पूछिए। उनके पैâसले पूछिए। दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां पूछिए। एसआईआर की प्रक्रिया पूछिए। राज्यों के चुनाव अधिकारियों की भूमिका पूछिए। नाम काटने और जोड़ने का पूरा रिकॉर्ड पूछिए। और अगर कोई आरोप है तो उसका दस्तावेज मांगिए। अब पैâसला प्रचार से नहीं, दस्तावेज और न्यायिक जांच से होना चाहिए। और यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। कहा जा रहा है कि ज्ञानेश कुमार गुप्ता के पुराने कार्यकाल को लेकर भी कुछ आरोप और दावे फिर चर्चा में आ रहे हैं। केरल के पूर्व मुख्य सचिव जी.जी. थॉमसन की ओर से भी गंभीर दावे किए गए हैं कि उन्हें भाजपा से चुनाव लड़ने और आगे मंत्री बनाए जाने की पेशकश की गई थी। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और दस्तावेजी जांच जरूरी है। लेकिन अगर ऐसा दावा सार्वजनिक हुआ है तो सवाल भी सार्वजनिक होगा किसने प्रस्ताव दिया, किस हैसियत से दिया और किसके कहने पर दिया? ज्ञानेश कुमार गुप्ता के पास इससे बेहतर मौका क्या होगा कि वह कहें पूछिए। जांच करिए। रिकॉर्ड देखिए। सच सामने लाइए। लेकिन अगर इस्तीफा आ गया तो सवाल पूछने वाला कह सकता है कि अब किससे पूछें। यही वजह है कि अधिकांश लोग कह रहे है कि ज्ञानेश कुमार गुप्ता इस्तीफा मत देना। अभी मत देना। अभी तो पार्टी शुरू हुई है। अभी जंतर-मंतर आबाद है। अभी स्वतंत्र मीडिया में सवाल हैं। अभी अदालत में सवाल हैं। अभी चुनाव आयोग के भीतर के सवाल बाहर आए हैं। अभी एसआईआर पर देश बहस कर रहा है। अभी १३ करोड़ नामों का सवाल जनता के सामने है। और अगर कल इन नामों में से बड़ी संख्या वापस जुड़ती है तो फिर असली सवाल यही होगा लोकतंत्र के दरवाजे पर पहले ताला किसने लगाया था? और क्यों लगाया था किसके कहने और किसको फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था? यह सवाल किसी एक अधिकारी से बड़ा है। यह महामानव नॉन-बॉयलोजिकल मोदी से बड़ा है। यह तड़ीपार शाह से बड़ा है। यह जननायक राहुल गांधी से भी बड़ा है। यह चुनाव आयोग से भी बड़ा है। यह भारत के मतदाता का सवाल है। इसलिए किसी व्यक्ति को बचाने या गिराने की राजनीति से आगे बढ़ना होगा। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता इन तीनों पर सार्वजनिक जांच जरूरी है। और शायद यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार गुप्ता का बने रहना आज किसी व्यक्ति की सुरक्षा नहीं, सवाल की सुरक्षा बन सकता है। वे रहें और हर सवाल का जवाब दें। वे रहें और हर फाइल खोलें। वे रहें और हर आरोप का सामना करें। वे रहें और अदालत में बताएं कि एसआईआर क्यों हुआ, वैâसे हुआ और किस आधार पर हुआ। क्योंकि अगर सब कुछ साफ है तो जांच से डर वैâसा? और अगर कुछ साफ नहीं है तो इस्तीफा समाधान नहीं है। लोकतंत्र में इस्तीफा अंतिम उत्तर नहीं होता। कभी-कभी इस्तीफा सवाल से भागने का रास्ता भी बन सकता है। इसलिए ज्ञानेश कुमार गुप्ता से विनती है ज्ञानू जी, अभी मत जाइए। आपके जाने की जल्दी उन लोगों को हो सकती है जो चाहते हैं कि मामला शांत हो जाए। आप रहेंगे तो मामला शांत नहीं होगा। आप रहेंगे तो सवाल जिंदा रहेंगे। और लोकतंत्र में सबसे जरूरी चीज सत्ता नहीं होती। सवाल होता है। क्योंकि सत्ता बदलती रहती है, लेकिन सवाल ही तय करते हैं कि लोकतंत्र बचा है या सिर्फ चुनाव हो रहे हैं। तो ज्ञानेश कुमार गुप्ता कुर्सी पर बैठे रहिए। सवालों के सामने बैठे रहिए। अदालत के सामने बैठे रहिए। जनता के सामने बैठे रहिए। क्योंकि अभी किसी व्यक्ति का अध्याय बंद करने का समय नहीं है। अभी तो चुनावी मशीन के पुर्जे खोलकर देखने का समय है। और हां सच और झूठ खुलेआम हुई बेईमानी वोट चोरी और सीना जोरी की अभी तो पार्टी शुरू हुई है। हर-हर… घर-घर… लाजिम है हम भी देखेंगे। सत्यमेव जयते..!
