मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर :  कमजोर हुई मोदी-शाह की पकड़?

प्रणवाक्षर :  कमजोर हुई मोदी-शाह की पकड़?

प्रणव प्रियदर्शी

क्या वाकई सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी पर मोदी और अमित शाह की पकड़ कमजोर होती जा रही है? ये दोनों भले ही औपचारिक तौर पर पार्टी संगठन से बाहर हों और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हों, लेकिन पिछले कम से कम १२ साल से पार्टी इन दोनों के इशारे पर ही चल रही है।
पार्टी का नया दौर
२०१४ में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से बीजेपी में जो दौर शुरू हुआ उसकी सबसे बड़ी खासियत ही यह बताई जाती रही है कि पार्टी में अभूतपूर्व अनुशासन आ गया। अटल-आडवाणी के दौर में समय-समय पर नेताओं के अलग-अलग सुर भी सुनाई दे जाते थे। मोदी-शाह के इस युग में पार्टी के बाहर ही नहीं, अंदर भी असहमति को जैसे अपराध मान लिया गया था। चाहे मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव (२०२३) में दो तिहाई बहुमत दिलानेवाले शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने की बात हो या महाराष्ट्र में बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री पद स्वीकारने के लिए बाध्य करने की, बीजेपी नेतृत्व बेधड़क ऐसे तमाम पैâसले करता रहा और कहीं किसी ने चूं तक नहीं की।
बेअसर हुए नवीन
ऐसे में अब जब इसके उलट संकेत मिल रहे हैं तो हैरानी लाजमी है। संकेत वैसे तो कई हैं, लेकिन यहां दो प्रमुख उदाहरणों पर विचार करना काफी होगा। बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को लेकर खुद प्रधानमंत्री मोदी कह चुके हैं कि वे नवीन को अपना बॉस मानते हैं। ऐसे नितिन नवीन अपनी खाली की हुई विधानसभा सीट पर अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रत्याशी बनवाएं यह स्वाभाविक था। जिसे उन्होंने चुना, उसके बारे में सारी जानकारी भी उनको रही होगी। बावजूद इसके, प्रत्याशी की आधिकारिक घोषणा हो जाने के बाद उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को मुद्दा बना दिया गया। नतीजा यह कि ‘पारिवारिक कारणों’ का हवाला देते हुए उस प्रत्याशी को पीछे हटना पड़ा। वहां से पार्टी ने प्रत्याशी बदल दिया।
नरोत्तम की निराशा
दूसरा उदाहरण दतिया उपचुनाव का है जहां मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा अपना टिकट तय मान कर चल रहे थे। ध्यान रहे, मिश्रा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बेहद करीबी और विश्वासपात्र नेता माने जाते रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र में अपना चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था। लेकिन जब पार्टी ने टिकट की घोषणा की तो मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी का नाम आ गया। टिकट कटने से बौखलाए नरोत्तम मिश्रा के समर्थक सड़कों पर उतर आए। न केवल मौजूदा मुख्यमंत्री मोहन यादव के खिलाफ गंदी गालियां निकाली गर्इं, बल्कि नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद के नारे भी लगाए गए।
बेकाबू होती होड़
इस तरह की अनुशासनहीनता और सर्वोच्च नेतृत्व के प्रति इस तरह की अवज्ञा मोदी-शाह युग वाली बीजेपी के लिए नई बात है। ऐसे में यह सवाल गंभीर हो जाता है कि क्या वाकई बीजेपी में हायरार्की की कड़ियां कमजोर हुई हैं? क्या अलग-अलग गुटों में परदे के पीछे अपना प्रभाव बढ़ाने की होड़ बेकाबू होने लगी है? क्या हाल की घटनाओं ने पार्टी के अंदर अनिश्चितता और असुरक्षा का माहौल बना दिया है?
कोई जवाब नहीं
यह तो साफ दिख रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का जो इकबाल था, वह कमजोर हुआ है। चाहे नीट पेपर लीक का मसला हो या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का, चारों तरफ सवाल ही सवाल हैं। इनका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल रहा। पीएम मोदी इन सबसे बेपरवाह एक के बाद दूसरे देश की यात्रा करते दिख रहे हैं। इससे ऐसा संदेश जा रहा है कि उनके पास भी कहने को कुछ नहीं है। वे बस लोगों की भावनाओं के अपने आप ठंडा होने का इंतजार कर रहे हैं।
टूटता तिलिस्म
आम तौर पर विदेश यात्राओं से मोदी के स्वागत-सत्कार के जो विजुअल्स आते हैं, उनसे देश के अंदर भी उनकी छवि सुधारने में मदद मिलती है। लेकिन छोटे-छोटे देशों से उन्हें मिलने वाले सम्मान अपनी चमक खो चुके हैं। दूसरी बात यह कि अब इंटरनेशनल मीडिया भी मोदी के प्रेस कॉन्प्रâेंस न करने और कार्यक्रमों में टेलीप्रॉम्पटर लगाकर बोलने की खिल्ली उड़ाता दिखने लगा है। इससे देश के अंदर भी उनकी छवि पर उलटा असर हो रहा है।
बाहर लिया आसरा
आश्चर्य नहीं कि इस स्थिति में मोदी के बाद कौन का सवाल पार्टी के अंदर के अलग-अलग गुटों को अपनी स्थिति मजबूत करने को प्रेरित कर रहा है। इस संदर्भ में यह बात अहम हो जाती है कि हाल में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के टूटे सांसदों को बीजेपी में शामिल करने के बजाय शिवसेना (शिंदे) और अनजान सी पार्टी एनसीपीआई में आसरा लेने को कहा गया। इसके पीछे यह सोच मानी जा रही है कि जब नया नेता चुनने का समय आए तो संघ या बीजेपी के विरोधी धड़े के प्रभाव से इन्हें बचाए रखा जा सके।
दुर्दिन कब कटेंगे
बहरहाल, अभी तो यह देखना होगा कि मोदी राज अपने दुर्दिन वैâसे काटता है। वैâसे वह इनसे उबरता है या कब इनकी भेंट चढ़ता है। तब तक पार्टी के अंदर हो या बाहर, यही अनिश्चितता और अस्थिरता देखने को मिलती रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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