धनुर्धर
अब देखिए बीजेपी के पात्रा जी ने कितना तगड़ा सवाल उठा दिया है राहुल गांधी पर। वैसे राहुल गांधी पर सवाल वे पहले से उठाते रहे हैं। खासकर उनकी पार्टी तो और पहले से उठा रही है। तब से जब मोदी जी गुजरात में थे और राष्ट्रीय राजनीति में छाने की तैयारी कर रहे थे। ये अलग बात है कि तब उनके अदृश्य हाथों से संचालित छुपी हुई ट्रोल आर्मी की उंगलियों की ताकत ज्यादा लोगों ने नहीं पहचानी थी। इन उंगलियों ने ही राहुल गांधी के सब किए-धरे पर पानी फेरकर उनके ऊपर ‘पप्पू’ का तमगा चिपका दिया था।
फीकी पड़ती चमक
लेकिन वे सब पुरानी बातें हैं। अब तो मोदी जी देश क्या दुनिया तक पर छाने के बाद चमक-चमककर थक चुके हैं। शायद इसीलिए उनकी आभा थोड़ी फीकी पड़ने लगी है। वरना क्या यह संभव था कि उनकी दोस्ती से अपना जनम सफल मानने वाले ट्रंप, पुतिन और शी जिनपिंग उनकी ओर से मुंह फेरकर पाकिस्तान को शांतिदूत की भूमिका दे बैठें। खैर… इधर राहुल गांधी हैं कि पप्पू की छवि से उबरकर नेता प्रतिपक्ष के रूप में गरजते फिर रहे हैं।
विपक्ष की ड्यूटी
यही बातें पात्रा जी के सवाल को संगीन बनाती हैं। पहले जब बीजेपी राहुल गांधी पर हमले बोलती थी तो वे सत्तापक्ष के एक अहम नेता हुआ करते थे। विपक्षी पार्टी का काम ही होता है सत्ता पक्ष को निशाने पर लेते रहना, बात-बेबात उस पर सवाल उठाते रहना। सो, विपक्ष की कोई भी पार्टी ऐसा करती है तो उसमें कोई खास बात नहीं होती। मिसाल के तौर पर आज कांग्रेस के लोग सरकार को घेरने की हरसंभव कोशिश करते रहते हैं। कोई उस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देता, क्योंकि सबको मालूम है कि कांग्रेस अपनी ड्यूटी कर रही है।
जवाब से क्या मतलब
बीजेपी और पात्रा जी के साथ यह बात नहीं है। सत्ता पक्ष में होने के बावजूद वे विपक्ष पर सवाल उठा रहे हैं। आप देखिए कि पात्रा जी ने बिल्कुल विपक्षी तेवर अपनाते हुए आक्रामक मुद्रा में सवाल उठाया कि राहुल गांधी की विदेश यात्रा पर अब तक कुल ६० करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। आखिर कहां से आए वे रुपए? सवाल किया और निकल गए। प्रेस कॉन्प्रâेंस खत्म। उस प्रेस कॉन्प्रâेंस का मकसद ही था सवाल उठाना। जवाब से उन्हें क्या मतलब? जवाब ही पाना होता तो प्रेस कॉन्प्रâेंस क्यों करते? दर्जनों दूसरे उपाय थे जवाब पाने के। पार्टी खुद पावर में है अभी। सारी एजेंसियां उसकी मुट्ठी में हैं। इशारा पाते ही वे एक-एक पैसे के खर्च का पूरा ब्योरा लाकर पात्रा जी के चरणों में रख देतीं।
हवा में सवाल
लेकिन राजनीति में सवाल उठाना जितना जरूरी होता है, उतना जवाब पाना नहीं। जवाब मिल जाए तो सवाल बेमानी साबित हो सकते हैं। इसलिए चतुर नेता सवाल हवा में उछाल देता है, उसके जवाब की ओर ध्यान नहीं देता। बल्कि नेता ज्यादा चतुर हो तो यह भी सुनिश्चित किए रहता है कि उसके उठाए सवालों के जवाब जल्द सामने न आएं। सवाल से सधने वाले सारे राजनीतिक हित सध जाएं, उसके बाद जवाब आना है तो आता रहे।
लोकतांत्रिक भावना
दूसरी जो बड़ी बात है इसमें वह है लोकतांत्रिक भावना। कुछ नादान लोग कहते हैं कि मोदी जी के राज में लोकतांत्रिक भावना कमजोर हुई है। लेकिन जब सवाल उठाने का जज्बा मजबूत हुआ है तो लोकतांत्रिक भावना कमजोर वैâसे हो सकती है। आप देखिए कि ओल्ड इंडिया यानी कि २०१४ से पहले के युग में विपक्ष सवाल उठाता था, सरकार खामोश रहती थी। अब यह न्यू इंडिया है, इसमें विपक्ष एक सवाल उठाता है तो सरकार दस सवाल उठा देती है।
ग्रासरूट लेवल तक
और यह तो कुछ नहीं। अभी लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप इस पैटर्न का विकेंद्रीकरण कर इसे ग्रासरूट लेवल तक पहुंचाया जाएगा। बिल्कुल थाना-पंचायत लेवल तक। पहले लोग सवाल उठाते थे कि चोरी-डवैâती बढ़ रही है, पुलिस खामोश रहती थी। अब लोग सवाल उठाएंगे तो उनसे ज्यादा जोर से पुलिस सवाल उठाएगी कि सेठ जी के घर में डाका वैâसे पड़ गया? अब जवाब देते रहें सेठ जी। पुलिस अकेली क्यों दे जवाब। गांव वाले सवाल उठाएंगे कि नवनिर्मित पंचायत भवन क्यों गिर गया तो यह मत सोचिए कि मुखिया जी सिट-पिटाकर चुप हो जाएंगे। वे भी सवाल उठाएंगे कि दगड़ू का कच्चा घर पिछली बरसात में क्यों गिर गया था?
आप कहेंगे इन सवालों का भला मतलब क्या है? मतलब कुछ हो या न हो, लोकतंत्र की भावना तो मजबूत हो रही है ना। न्यू इंडिया में और चाहे जो हो जाए किसी को मुंह उठाकर यह नहीं कहने दिया जाएगा कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)
