प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी आज देश की सबसे सक्रिय जांच एजेंसियों में गिनी जाती है। पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री, कर्नाटक के विधायक, छत्तीसगढ़ के डीएमएफ फंड से जुड़े अधिकारी, उद्योगपति अनिल अंबानी समूह की संपत्तियां, राजनीतिक सलाहकार और पुलिस अफसर, ईडी की कार्रवाई का दायरा लगातार पैâलता जा रहा है। पहली नजर में यह आर्थिक अपराधों के खिलाफ कठोर कार्रवाई लगती है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू कहीं अधिक गंभीर है।
ईडी की कार्रवाई अब जांच से ज्यादा राजनीतिक संदेश जैसी दिखने लगी है। विपक्षी दलों के नेताओं और चुनावी राज्यों में अचानक तेज होती कार्रवाइयों ने यह धारणा मजबूत की है कि एजेंसी सिर्फ धनशोधन की जांच करने वाली संस्था नहीं रह गई, बल्कि सत्ता के हाथ में राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता सबसे बड़ा भरोसा होती है, लेकिन जब एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, तो हर छापा, हर गिरफ्तारी और हर कुर्की न्याय से पहले राजनीतिक कार्रवाई जैसी दिखाई देने लगती है।
सबसे बड़ा सवाल आंकड़ों से उठता है। अगर हजारों पीएमएलए मामलों में सजा केवल गिने-चुने लोगों को मिलती है, तो क्या ईडी की कार्रवाई अदालत में टिकाऊ है या सिर्फ खबरों में असरदार? क्या गिरफ्तारी ही सजा बन गई है? क्या लंबी जांच, लंबी हिरासत और संपत्ति कुर्की ही राजनीतिक दबाव का नया तरीका है?
आर्थिक अपराधों पर कार्रवाई जरूरी है। भ्रष्टाचार, हवाला, सट्टेबाजी, भर्ती घोटाले और सरकारी धन की लूट को किसी भी हालत में छोड़ा नहीं जा सकता। लेकिन जांच एजेंसी का काम न्याय दिलाना है, राजनीतिक माहौल बनाना नहीं। अगर ईडी की छवि निष्पक्ष जांच एजेंसी के बजाय सत्ता की डंडा-एजेंसी जैसी बनने लगे, तो यह केवल विपक्ष का संकट नहीं, पूरे लोकतंत्र की चेतावनी है।
ईडी की कार्रवाई अब जांच से ज्यादा राजनीतिक संदेश जैसी दिखने लगी है। विपक्षी दलों के नेताओं, क्षेत्रीय दलों से जुड़े चेहरों और चुनावी राज्यों में अचानक तेज होती कार्रवाइयों ने इस धारणा को मजबूत किया है कि एजेंसी सिर्फ आर्थिक अपराधों की जांच तक सीमित नहीं रही, बल्कि सत्ता के राजनीतिक औजार के रूप में भी इस्तेमाल हो रही है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। जब जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें, तो हर छापा, हर गिरफ्तारी और हर कुर्की न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही राजनीतिक हथियार की तरह दिखाई देने लगती है। इसलिए आज आम धारणा यही बन रही है, जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे ईडी। लेकिन लोकतंत्र का असली सवाल यह है कि जहां ईडी पहुंचती है, वहां न्याय पहुंचता है या केवल सत्ता की छाया?
