अरुण कुमार गुप्ता
राजनीति में एक शब्द बहुत जोर देकर बोला जाता है, वह है जमीन से जुड़ा नेता। ‘जमीन’ से जुड़ा नेता बनना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। तब जाकर कहीं यह तमगा मिलता है। फिलहाल, बात हो रही है जमीन की तो हाल-फिलहाल कई जमीनी नेता बाहर निकल रहे हैं। इन नेताओं को बाहर निकालने का काम अब विपक्ष कर रहा है। हाल के जमीनी नेता उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के पुत्र पार्थ पवार निकले। पार्थ पवार पर आरोप लगे कि उन्होंने पुणे में १,८०० करोड़ की जमीन ३०० करोड़ में हथिया ली, वह भी मात्र ५०० रुपए स्टांप शुल्क भरकर। इस बीच एक और जमीन से जुड़ा मामला राकांपा नेता एकनाथ खडसे ने उजागर किया। खडसे ने कहा कि पुणे के बोपोडी में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन हथिया ली गई। इन सब मामलों के बीच कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने शिंदे गुट के मंत्री प्रताप सरनाईक को जमीनी नेता के रूप में ढूंढ निकाला। विजय वडेट्टीवार ने सरनाईक पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने मीरा-भायंदर में २०० करोड़ की जमीन महज ३ करोड़ में ही हथिया ली है। बताया जाता है कि यह जमीन सरनाईक ने अपने शैक्षणिक संस्थान के लिए ली है। उधर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जानेवाले मंत्री गिरीश महाजन के भी जमीनी नेता बनने की बात कही जा रही है। इस जमीनी नेता को शिवसेना के पूर्व सांसद उन्मेष पाटील ने ढूंढ निकाला है। ऐसे में अब यही कहा जा रहा कि देश की राजनीति में भले ही वोट चोरी की बात हो रही हो, लेकिन महाराष्ट्र में नेताओं की नजर जमीनों पर है। उनका एक ही लक्ष्य है कि किसी भी तरह से इन जमीनों को हासिल करना। विपक्ष चिल्लाता है तो चिल्लाने दो, कुछ समय बाद शांत हो जाएगा, लेकिन वर्तमान में जमीनी नेता वैâसा, जो जमीन न हथियाये।
शिंदे गुट का डर!
अक्सर देखा जाता है कि चुनाव जीतने के बाद नेता पूरे पांच साल तक या तो अंतर्धान रहते हैं या फिर मलाई खाने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि जनता जनार्दन को ही भूल जाते हैं। हालांकि, बहुत कम ऐसे नेता हैं जो इस दौरान जनता के बीच रहते हैं, लेकिन जो जनता के बीच नहीं रहते हैं वे फिर चुनाव जीतने के लिए तिकड़म यानी जोड़-तोड़ में जुटे रहते हैं। कुछ यही हाल इस समय शिंदे गुट के नेताओं का है। स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक आते देख वे जोड़तोड़ में जुट गए हैं। ऐसे नेताओं में मंत्री भरत गोगावले का नाम सामने आ रहा है जो महायुति सरकार में सहयोगी दलों से एकजुटता की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर एक साथ नहीं लड़े, तो जनता उन्हें उनकी जगह दिखा देगी। भरत गोगावले ने कहा कि हमारी आज भी यही भूमिका है कि निकाय चुनाव महायुति के रूप में लड़े जाएं। अगर हम एकजुट हुए तो विपक्ष को कोई जगह नहीं मिलेगी, लेकिन अगर कोई अलग-अलग लड़ने की बात करेगा, तो जनता उन्हें उनकी जगह दिखा देगी। ऐसे में अब यहां आसानी से कहा जा सकता है कि गोगावले का डर वाजिब है। जनता को पांच साल तक अंधेरे में रखकर मलाई का मजा लेनेवाले नेताओं में डर जरूरी है, जिससे शायद सबक लेते हुए भविष्य में सुधार हो सके।
विकास फंड की मलाई!
विधायकों और मंत्रियों को अपने-अपने क्षेत्र के विकास के लिए निर्धारित विकास निधि आवंटित की जाती है। इस विकास निधि को लेकर नेताओं में अक्सर विवाद भी देखने को मिलता है। विवाद इस बात को लेकर रहता है कि हमारे क्षेत्र के लिए कम निधि आवंटित की गई और दूसरे को ज्यादा दी गई। वाकई यह लड़ाई विकास निधि की नहीं, बल्कि मलाई की होती है क्योंकि कम विकास निधि का मतलब कम मलाई। इस मलाई को अब और उस बात से बल मिला है जब दहिसर से विधायक मनीषा चौधरी और विधान परिषद से विधायक प्रवीण दरेकर की लड़ाई सामने आई है। दरअसल, प्रवीण दरेकर दहिसर विधानसभा क्षेत्र में अपने फंड का अच्छा-खासा हिस्सा खर्च कर रहे हैं। बताया जाता है कि दरेकर अपने लोगों को दहिसर में मजबूत बनाकर चुनावी मैदान में उतरना चाहते हैं, जबकि दहिसर विधानसभा में उनकी घुसपैठ से स्थानीय विधायक मनीषा चौधरी नाराज हो गई हैं। उन्होंने इस मामले में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीधे शिकायत कर डाली, लेकिन यहां यह ध्यान देनेवाली बात है कि असली लड़ाई राजनीतिक नहीं है, बल्कि विकास फंड की मलाई को लेकर है। यह बात राजनीति के जानकारों द्वारा कही जा रही है। फिलहाल, जो भी हो दरेकर मनीषा चौधरी की मलाई में मक्खी डालने पर तुले हुए हैं। अब देखना होगा कि भविष्य में इसका परिणाम क्या निकलता है।
