मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी : समंदर, सर्दी और एक ठहरी हुई शाम

रिपोर्टर डायरी : समंदर, सर्दी और एक ठहरी हुई शाम

जेदवी

कुछ शामें खबर नहीं बनतीं, अनुभव बन जाती हैं। धीमे-धीमे भीतर उतरती हुई। आज की शाम भी वैसी ही थी। सर्दियों की धूप जब मुंबई की ऊंची इमारतों के कंधों से फिसलकर विदा लेने लगी, तो कदमों ने बिना पूछे समंदर की राह पकड़ ली। आम तौर पर सर्द मौसम में समंदर की हवा ठिठुरन का एहसास कराती है, मगर आज उसकी सांसों में अजीब-सा अपनापन था, जैसे शहर की तेज रफ्तार से थोड़ी देर की छुट्टी मिल गई हो।
रेत पर चलते ही समुद्री हवा ने चेहरे को सहलाया। लहरें आज उग्र नहीं थीं; वे शांत थीं, संयत थीं-मानो सर्दियों की इस ठहरी हुई शाम को खुद भी महसूस कर रही हों। डूबते सूरज की केसरिया आभा पानी पर पैâलती चली गई और क्षितिज पर उसका समंदर में समा जाना दिन और रात के बीच की उस महीन रेखा को उकेरता रहा, जहां शोर थम जाता है और एहसास बोलने लगते हैं।
किनारे का दृश्य अपने-आप में एक कहानी था। शॉल और स्वेटर में लिपटे लोग, हथेलियों में गर्म चाय की प्यालियां, पास ही भुट्टे की सोंधी खुशबू-यह सब किसी सजी हुई तस्वीर जैसा नहीं, बल्कि जिंदगी की सादी, सच्ची झलक जैसा था। लहरों की आवाज लगातार कानों में गूंजती रही, एक ऐसा संगीत, जो महानगर के कोलाहल से बिल्कुल उलट था; धीमा, भरोसेमंद और सुकून देने वाला।
धीरे-धीरे अंधेरा गहराने लगा। चांदनी ने पानी पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और उसी पल यह एहसास हुआ कि कुदरत बिना किसी प्रचार के भी कितनी प्रभावशाली हो सकती है। यह शाम सिर्फ मौसम के बदलने की कहानी नहीं थी; यह अपने-आप से थोड़ी देर की मुलाकात थी बिना सवालों के, बिना जवाबों के।
अब घर लौट रही हूं।
लेकिन मन अब भी वहीं ठहरा है
लहरों के पास,
जहां शब्द कम थे और एहसास कहीं ज्यादा।

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