सुनिल ओसवाल
करप्शन और बदमिजाजी के लिए बदनाम आरटीओ का चेहरा बदलने के लिए आरटीओ के कर्मचारियों को तमीजदार बनाने की कोशिश रंग लाती नजर नहीं आ रही। आम जनता के साथ किस तरह सज्जनता से पेश आया जाए, इसका ज्ञान उन्हें सरकार ने दिया था कुछ महीना पहले। मुंबई आरटीओ दफ्तर से सुनील ओसवाल की रिपोर्टर डायरी।
मुंबई का माहौल हमेशा चहलकदमी से भरा रहता है- पर जब कदम आरटीओ कार्यालय की ओर बढ़ते हैं तो यह चहल-पहल अचानक धीमी पड़ जाती है। कारण? सरकारी व्यवस्था की वही पुरानी दीवारें, जिनके आगे हर आम नागरिक की आवाज टकराकर लौट आती है। सुबह के ग्यारह बजे थे। मैं मुंबई के बोरिवली स्थित आरटीओ कार्यालय पहुंचा। किसी ने बताया कि आयुक्त के आदेश हैं कि ‘जनता से सौजन्यपूर्ण व्यवहार करें’।
मन में उम्मीद की किरण जगी। सोचा, शायद परिवहन आयुक्त विवेक भीमनवार के उस हालिया सौजन्य आदेश का असर यहां दिखेगा, जहां कहा गया था कि हर नागरिक से नम्रता, मुस्कान और आदर के साथ पेश आया जाए। मगर जैसे ही अंदर गया, वह उम्मीद हवा हो गई।
काउंटर नंबर ३ पर एक युवक फॉर्म हाथ में लिए खड़ा था। बोला- ‘सर, मैंने ऑनलाइन सब कर लिया है, बस वेरिफिकेशन रह गया।
’नमस्कार
अधिकारी ने बेमन से जवाब दिया, ‘सिस्टम डाउन है, कल आना।’ पास खड़े एक बुजुर्ग सज्जन ने धीरे से कहा, ‘बेटा, मैं तो तीन दिन से आ रहा हूं, शायद सिस्टम को भी छुट्टी चाहिए।’
सब हंसे, लेकिन उस हंसी में दर्द था। ऑफिस के एक कोने में महिला कर्मचारी दस्तावेज पलटते हुए बोलीं- ‘अगला कौन?’
किसी ने डरते-डरते कहा- ‘मैडम, मेरी फाइल कल से पेंडिंग है।’
उत्तर आया- ‘तो आज भी रह जाएगी, कल आना।’
मैंने सोचा, अगर यह सौजन्य है तो असभ्यता कैसी होगी?
ऐसा था आदेश परिवहन आयुक्त विवेक भीमनवार ने आदेश दिया था कि राज्यभर के सभी आरटीओ दफ्तरों में नागरिकों के साथ शालीनता से पेश आया जाए। वाहन जांच के दौरान भी असभ्य भाषा या अपमानजनक व्यवहार न हो।
वरिष्ठ अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो और हर कर्मचारी नागरिक से बातचीत की शुरुआत ‘नमस्कार’ से करे, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल उलट है।
‘सिस्टम डाउन’- सबसे बड़ा बहाना
मुंबई आरटीओ कार्यालय में सबसे ज्यादा सुना जानेवाला वाक्य है- ‘सिस्टम डाउन है।’ यह सिस्टम है या ढाल, समझना मुश्किल है।
एक नागरिक ने मुझे बताया-
‘भाईसाहब, यहां हर दिक्कत की एक ही दवा है- सिस्टम डाउन। बस रिश्ता सही हो तो सिस्टम तुरंत अप!’ लाइसेंस, फिटनेस, ट्रांसफर या परमिट- हर काम में टालमटोल।
काउंटर के पार से जो आवाज आती है, उसमें न शालीनता है, न संवेदनशीलता।
कर्मचारी का चेहरा बताता है- वह काम कर रहा है, क्योंकि करना पड़ रहा है, सेवा की भावना से नहीं। जनता की शिकायतें, अफसरों की चुप्पी
ऑफिस के बाहर एक युवक मिला- आईटी कंपनी में काम करता है।
बोला, ‘साहब, सरकार डिजिटल इंडिया की बात करती है और यहां अभी भी फाइलें रस्सियों से बंधी हैं।’ उसकी बात सच लगी।
चारों तरफ पुराने रजिस्टर, धूल भरे फाइल कैबिनेट और घड़ी की टिक-टिक जो मानो रुक गई हो। जब मैंने एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा कि आदेश पर अमल क्यों नहीं हो रहा। उन्होंने कहा, ‘हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन स्टाफ कम है और काम ज्यादा।’ यानी आदेश तो आया, पर इरादा नहीं बदला।
सेवाभाव या सत्ता-अहंकार?
आरटीओ कार्यालयों का रवैया अब सेवाभाव से ज्यादा सत्ता-अहंकार का प्रतीक बन गया है। नागरिकों को सेवा देने की बजाय, उन्हें ‘सिखाने’ की प्रवृत्ति बढ़ गई है।
‘नमस्कार! बताइए, क्या काम है?’ यह वाक्य आदेशों में है, पोस्टरों में है, पर अफसरों की जुबान पर नहीं। मुंबई से सबक मुंबई का आरटीओ कार्यालय राज्य का चेहरा है। अगर यहां सुधार नहीं दिखता तो छोटे शहरों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
जनता अब बदलाव चाहती है – व्यवहार में, व्यवस्था में और जवाबदेही में।
क्योंकि कागजों पर लिखे आदेश नहीं, काउंटर के उस पार से मिलनेवाली एक मुस्कान ही असली ‘सेवा’ कहलाती है। अंत में… दफ्तर से निकलते वक्त मैंने आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा-एक थका हुआ बुजुर्ग, एक परेशान युवक और काउंटर के पार एक चुप अधिकारी। तीनों अपने-अपने हाल में थमे हुए। आदेश दीवार पर टंगा था- ‘जनता से सौजन्यपूर्ण व्यवहार करें।’ पर उस दीवार के पार, सौजन्य अब भी गुमशुदा है।
