मैदान में ‘धर्म-उपदेश केंद्र’ के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं गिरगांवकर
राजन पारकर / मुंबई
गिरगांव की हवा हमेशा बेबाक रही है, पर इस बार वह कुछ ज्यादा ही तपेली लगती है। कभी खिलाड़ियों के पसीने से पवित्र हुआ विल्सन जिमखाना आज कुछ खास लोगों को अचानक ‘धर्म–केंद्र’ जैसा दिखने लगा है। खेल के मैदान पर आध्यात्मिक कक्षाएं खोलने का विचार ऐसे चमका, मानो किसी ने बनाने की घोषणा कर दी। मैदान में वह सब कुछ करने की तैयारी है, बस क्रिकेट, फुटबॉल और कबड्डी छोड़कर बाकी सब। यह स्थिति उतनी ही हास्यास्पद है, जितना कि किसी का चौपाटी पर साइलेंस जोन बनाने का प्रस्ताव देना। गिरगांवकर भला यह वैâसे सहन करते? कमर कसकर मैदान बचाने की हुंकार लगा दी क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मिट्टी की नहीं, अस्तित्व की है।
जिस संस्था का खेल से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, उसे मैदान सौंपने का विचार गिरगांवकरों को ऐसा लगा, ‘मानो एक ऊंट को बुलेट ट्रेन का पायलट बनाने का प्रस्ताव।’ मैदान ज्ञान–उपदेश का केंद्र नहीं होता, यह वह जगह है जहां बच्चे गिरते हैं, उठते हैं, दौड़ते हैं, हारते हैं। जीतते हैं। धर्म–कक्षाएं खेल के मैदान में डालना वैसा ही हास्यास्पद है, जैसे समंदर में चाय उबालने की कोशिश! विल्सन कॉलेज ने इस मैदान को वर्षों तक संभाला और गिरगांव की पहचान का हिस्सा बनाया। आज की युवा पीढ़ी मोबाइल में ऐसे खोई है कि उसे दौड़ने का मतलब स्क्रॉल करना लगता है। अगर मैदान गिरगांवकर प्रतिष्ठान को मिलता है तो यहां मराठी पारंपरिक खेल, कबड्डी की ‘हू तू तू’, खो-खो की दौड़, और बच्चों की असली चीख–पुकार फिर गूंजेगी। कम से कम बच्चे सोसायटी के पार्विंâग में क्रिकेट खेलने से ऊपर उठकर खेल के असली मैदान में पसीना बहाएंगे। गिरगांव की संस्कृति में कोली समाज वो नमक है, जो हट जाए तो पूरा स्वाद फीका पड़ जाए। मैदान के किनारे उन्हें स्थान देना सिर्फ परंपरा नहीं, गिरगांव की आत्मा को जगह देना है।मैदान खोया तो अगली पीढ़ी खो जाएगी और यदि पीढ़ी खो गई तो गिरगांव की आवाज, उसकी संस्कृति, उसका फौलादी स्वभाव भी खो जाएगा। इसीलिए ‘हम गिरगांवकर’ टीम, मराठी जनता और विल्सन कॉलेज के पूर्व–वर्तमान विद्यार्थी २५ तारीख, मंगलवार, दोपहर ३ बजे माननीय जिलाधिकारी के समक्ष निवेदन देने निकलने वाले हैं। संदेश साफ है, ‘मैदान में खेल चलेंगे, उपदेश नहीं!’
