अनिल मिश्र / पटना
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के भूगोल विभाग के शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा किए गए महत्वपूर्ण शोध अध्ययन में गया जिले में भूजल संभाव्यता वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक रूप से पहचान की गई है। यह अध्ययन भूगोल विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. सुनीता सिंह तथा उनके शोधार्थियों तरुण कुमार और वैश्नवी स्वामी द्वारा किया गया है। यह शोध इंडरसाइंस प्रकाशक द्वारा प्रकाशित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ वाटर में प्रकाशित हुआ है, जो स्कोपस (एल्सेवियर) में अनुक्रमित है। अध्ययन में गया जिले में भूजल की उपलब्धता का एक महत्वपूर्ण स्थानिक चित्र प्रस्तुत किया गया है। गया में भूजल कृषि, घरेलू जलापूर्ति तथा ग्रामीण समुदायों की आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह, कुलसचिव प्रो. नरेंद्र कुमार राणा, भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. किरण कुमारी तथा अन्य संकाय सदस्यों ने इस महत्वपूर्ण शोध परिणाम और प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में इसके प्रकाशन के लिए डॉ. सुनीता सिंह एवं उनकी टीम को बधाई दी। इस संबंध में दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) जन संपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि शोध के निष्कर्षों के अनुसार गया जिले का 43.70 प्रतिशत क्षेत्र अच्छे से मध्यम भूजल संभाव्यता वाले क्षेत्र की श्रेणी में आता है, जबकि 25.45 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम भूजल संभाव्यता की श्रेणी में है। लगभग 9.67 प्रतिशत क्षेत्र में भूजल की अच्छी संभावनाएं हैं, जबकि 14.03 प्रतिशत और 7.15 प्रतिशत क्षेत्र क्रमशः निम्न और बहुत निम्न भूजल संभाव्यता वाले क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किए गए हैं।अध्ययन से गया जिले में भूजल संभाव्यता के संबंध में एक स्पष्ट भौगोलिक स्वरूप सामने आया है। जिले के उत्तरी भागों में मुख्यतः अच्छी से मध्यम भूजल संभावनाएं पाई गई हैं। इसका संबंध अपेक्षाकृत समतल भू-आकृति, कृषि भूमि, अनुकूल वर्षा तथा जलोढ़ भू-भाग से है। मध्यवर्ती एवं नदी तटीय क्षेत्रों में भी अपेक्षाकृत अनुकूल परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। इसके विपरीत, कठोर चट्टानी भू-भाग, चट्टानी सतहों तथा अधिक ढाल वाले दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में भूजल की संभावनाएं तुलनात्मक रूप से कम पाई गई हैं। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में मिश्रित स्वरूप दिखाई देता है, जो भू-आकृति, भूविज्ञान, जल निकासी तथा भूमि की विशेषताओं में विविधता को दर्शाता है। समग्र रूप से, जिले में भूजल की संभावनाओं में स्थानिक विविधता पाई गई है, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप भूजल प्रबंधन और पुनर्भरण की योजना बनाने के महत्व को रेखांकित करती है। इस शोध के निष्कर्ष से तैयार किया गया भूजल संभाव्यता मानचित्र भविष्य में भूजल पुनर्भरण कार्यक्रमों, वर्षा जल संचयन, जल संसाधन नियोजन तथा अधिक संरक्षण की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान के लिए वैज्ञानिक आधार के रूप में उपयोगी हो सकता है। विशेष रूप से, यह भविष्य की योजना निर्माण तथा भूजल संरक्षण से संबंधित पहलों के लिए एक वैज्ञानिक स्थानिक आधार प्रदान करता है।
