-जेन-जी के आक्रोश पर लगेगा डिजिटल पहरा?
अनिल तिवारी
बच्चों को इंटरनेट की लत, साइबर बुलिंग और हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए फ्रांस ने १५ साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित कर दिया है। संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद फ्रांस ऐसा व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला यूरोपीय संघ का पहला देश बन गया है। कानून में हाई स्कूल परिसरों के भीतर मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों चाहते हैं कि नया कानून १ सितंबर २०२६ से लागू हो। इसके तहत १५ साल से कम उम्र के बच्चे नए सोशल मीडिया खाते नहीं बना सकेंगे, जबकि प्लेटफॉर्मों को पुराने खातों को हटाने के लिए समय दिया जाएगा। पढ़ाई, विज्ञान, ऑनलाइन ज्ञानकोश और कुछ शैक्षणिक सेवाओं को पाबंदी से बाहर रखा गया है। हालांकि, उम्र की विश्वसनीय जांच, उपयोगकर्ताओं की निजता और पुराने खातों की पहचान इस कानून की सबसे बड़ी चुनौतियां मानी जा रही हैं। संवैधानिक समीक्षा के कारण इसके क्रियान्वयन में देरी भी संभव है।
फ्रांस ने यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम से टकराव से बचने के लिए विधेयक में बदलाव किए हैं। ऑस्ट्रेलिया पहले ही १६ साल से कम उम्र के बच्चों पर ऐसा प्रतिबंध लागू कर चुका है, जबकि तुर्किये और इंडोनेशिया सहित कई देश बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच सीमित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। ब्रिटेन में भी इसी तरह के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है।
लेकिन भारत में इस बहस का एक राजनीतिक पहलू भी उभर सकता है। सरकार बच्चों की सुरक्षा, फर्जी खबरों और ऑनलाइन हिंसा का हवाला देकर सोशल मीडिया पर नए नियंत्रण ला सकती है। चिंता यह है कि कहीं आयु प्रतिबंध की आड़ में सत्यापन, पहचान और सामग्री नियंत्रण के ऐसे नियम न बना दिए जाएं, जिनसे युवाओं, विशेषकर सरकार से सवाल पूछने वाली जेन-जी की पहुंच और अभिव्यक्ति सीमित हो जाए। फिलहाल, भारत सरकार द्वारा फ्रांस जैसा राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध घोषित नहीं किया गया है।
इसलिए राजनीतिक आक्रोश दबाने की योजना को स्थापित तथ्य नहीं, बल्कि संभावित दुरुपयोग की आशंका के रूप में ही देखा जाना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन उसकी आड़ में असहमति पर डिजिटल पहरा लोकतंत्र के लिए अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।
आम धारणा यह है कि अपने खिलाफ होने वाले विरोधों को कुचलने में विश्वास रखने वाली भारत सरकार इस दिशा में विचार कर सकती है। फ्रांस के फैसले की आड़ में भारत सरकार भी सोशल मीडिया की पहुंच सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। आशंका है कि बच्चों की सुरक्षा, फर्जी खबरों और ऑनलाइन हिंसा को आधार बनाकर ऐसे नियम बनाए जाएं, जिनका असली असर सरकार से सवाल पूछने वाली युवा पीढ़ी पर पड़े। केंद्रीय एजेंसियों, संसदीय बहुमत और नियम-कानून में बदलाव के जरिए सरकार विपक्ष तथा प्रशासनिक बाधाओं से तो निपट सकती है, लेकिन सड़कों और सोशल मीडिया पर उभरते जेन-जी के आक्रोश को नियंत्रित करना उसके लिए आसान नहीं है। ऐसे में सीमित प्रतिबंध, अनिवार्य उम्र सत्यापन, अकाउंट पहचान और सामग्री नियंत्रण जैसे उपाय राजनीतिक असंतोष को कमजोर करने के औजार बन सकते हैं। सरकार भविष्य में फ्रांस और अन्य देशों का उदाहरण देकर इन कदमों को बच्चों की सुरक्षा के लिए जरूरी बता सकती है, जबकि आलोचकों को डर है कि इसका इस्तेमाल डिजिटल अभिव्यक्ति और असहमति पर पहरा लगाने के लिए भी किया जा सकता है।
