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संकट हरेंगे श्रीगणेश

शीतल अवस्थी

भारतीय संस्कृति में धार्मिक दृष्टि से माघ मास को विशेष स्थान प्राप्त है। मघा नक्षत्र से युक्त होने के कारण इस महीने का नाम माघ नाम पड़ा। माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए तिल चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इसे संकटा चतुर्थी व्रत भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन जो कोई भगवान गणेश की पूजा श्रद्धा और भक्ति भाव से करता है, उसकी सभी व्याधियों को गणेशजी हर लेते हैं। सभी प्रकार के विघ्न तथा बाधाओं से उसे मुक्ति मिलती है।
माघ माह की कृष्ण पक्ष की गणेश चतुर्थी को जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से गणेशजी का उपवास करते हैं, गणेशजी प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। यह चतुर्थी सभी प्रकार के संकटों को हरने वाली होती है, इसलिए इसे संकष्ट चतुर्थी कहा गया है। यह व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं तथा भगवान श्रीगणेश असीम सुखों की प्राप्ति कराते हैं।
पौराणिक गणेश कथा के अनुसार, एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे, तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है, तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे, तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा। तब गणेश ने कहा, ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।’ यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी।
इस दिन सुबह स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। उसके बाद श्रीगणेश की पूजा करें। भगवान गणेश की धूप-दीपादि से आराधना करनी चाहिए। उन्हें फल-फूल, अक्षत, रौली-मौली, पंचामृत से स्नानादि करा कर तिल से बनी वस्तुओं या तिल-गुड़ के लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए। पूजा करते समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। संध्या काल में कथा सुनने के पश्चात गणेशजी की आरती करनी चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले श्रद्घालुओं की समस्त मनोकामना अवश्य पूरी होती है। अत: सुबह गणेश पूजन करें। पूजा के साथ यदि अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाए तो अति उत्तम। हो सके तो गणेश द्वादश नामावली का पाठ करें। दिन में अथवा गोधूली वेला में गणेश दर्शन अवश्य करें। शाम को सहस्र मोदक या स्वेच्छानुसार लड्डुओं का भोग अर्पित करें। सहस्र दुर्वा अर्पण करें। हो सके तो सहस्र मोदक से हवन अवश्य करें। स्नान कर भगवान श्री गणेश को कुमकुम, लाल चंदन, सिंदूर, अक्षत, अबीर, गुलाल, फूल, फल, वस्त्र, जनेऊ आदि पूजा सामग्रियों के अलावा खास तौर पर २१ दूर्वा चढ़ाएं। दूर्वा श्री गणेश को विशेष रूप से प्रिय मानी गई है। दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे १० मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें। मंत्रों के साथ पूजा के बाद यथाशक्ति मोदक का भोग लगाएं। २१ मोदक का चढ़ावा श्रेष्ठ माना जाता है। मंत्र जप के बाद भगवान गणेश की आरती गोघृत यानी गाय के घी के दीप और कर्पूर से करें। अंत में भगवान गणेश से हर पीड़ा, दु:ख, संकट, भय व बिघ्न का अंत करने की प्रार्थना कर सफलता की कामना करें। यह मंत्र जप किसी भी प्रतिकूल या संकट की स्थिति में पवित्र भावना से स्मरण करने पर शुभ फल देता है। अंत में श्री गणेश आरती कर क्षमा प्रार्थना करें। कार्य में विघ्र बाधाओं से रक्षा की कामना करें।

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