अशोक मेहता
(नमोकार फाउंडेशन)
हमारे समाज में प्रेरणा कई बार उन लोगों से मिलती है, जिनकी जिंदगी बाहर से साधारण, लेकिन भीतर से असाधारण होती है। हाल ही में नववर्ष के अवसर पर जनवरी में वित्त विशेषज्ञ भरतकुमार सोलंकी ने अपने गांव के एक बुजुर्ग व्यक्ति ‘पकूबा’ की कहानी मुझसे साझा की।
पकूबा का जीवन अपने आप में एक रहस्य था। न उन्होंने कभी कोई व्यवसाय किया, न ही किसी से मदद मांगी। आत्मसम्मान इतना प्रबल कि किसी का दिया हुआ भोजन या वस्त्र भी स्वीकार नहीं करते थे। फिर भी उनका जीवन चलता रहा, बिना किसी पर निर्भर हुए।
उनकी एक आदत बेहद खास थी, गांव की गलियों से गुजरते समय उनकी नजर हमेशा जमीन पर रहती थी। जहां कहीं भी उन्हें कचरे में पड़ी खाली टूथपेस्ट की ट्यूब दिखती, वे उसे उठा लेते। बाद में इन्हीं ट्यूबों को इकट्ठा कर भंगार में बेचकर वे अपना गुजारा करते थे।
यह कहानी केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और सूझबूझ का जीवंत उदाहरण है।
इसी प्रेरणा को आधार बनाकर हमने नमोकार फाउंडेशन के माध्यम से एक छोटा-सा प्रयास शुरू किया। सोलंकी के सुझाव पर पाली, सिरोही, जालोर और महाराष्ट्र के कुछ जिलों के विद्यालयों से संपर्क कर बच्चों को प्लास्टिक कचरा एकत्रित करने के लिए प्रेरित किया गया, ताकि वे न केवल स्वच्छता का महत्व समझें, बल्कि ‘कचरे में कमाई’ का व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त करे। आज यह देखकर संतोष होता है कि २५ से अधिक विद्यालयों के सैकड़ों विद्यार्थी इस अभियान से जुड़ चुके हैं। वे उत्साह के साथ प्लास्टिक एकत्रित कर रहे हैं और समझ रहे हैं कि छोटे-छोटे प्रयास वैâसे बड़े बदलाव का आधार बन सकते हैं। नमोकार फाउंडेशन पहले से ही मारवाड़ क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे को एकत्रित कर उससे उपयोगी बेंच बनाने का कार्य कर रहा है। अब इस नई पहल ने बच्चों को भी इस मुहिम से जोड़ दिया है, जिससे उनमें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और उद्यमशीलता दोनों का विकास हो रहा है। पकूबा जैसे अनजाने नायक हमें यह सिखाते हैं कि संसाधन चाहे जितने सीमित हों, यदि सोच सकारात्मक और आत्मसम्मान दृढ़ हो, तो जीवन की राह खुद बन जाती है। यह पहल केवल स्वच्छता अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को आत्मनिर्भर, जागरूक और संवेदनशील बनाने की दिशा में एक सशक्त कदम है।
