सुरेश गोलानी
स्वच्छ सर्वेक्षण में कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य और ३ से १० लाख की आबादी वाले शहरों की श्रेणी में सबसे स्वच्छ शहर का प्रेसिडेंशियल अवॉर्ड मिलने पर मीरा-भायंदर महानगरपालिका अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
गौरतलब है कि स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने और शहर की स्वच्छता व्यवस्था में क्रांति लाने का दावा करने वाली मनपा ने एक निजी ठेकेदार के माध्यम से सार्वजनिक स्थानों पर हाईटेक ई-शौचालय स्थापित किए थे। साथ ही नागरिकों के बीच इनके उपयोग को लेकर जागरूकता पैâलाने के भी बड़े-बड़े दावे किए गए थे। इस अभियान के तहत मनपा ने वर्ष २०२० में शहर के विभिन्न आवासीय, औद्योगिक और व्यावसायिक इलाकों में लाखों रुपए की लागत से ई-टॉयलेट (स्वचालित सार्वजनिक स्मार्ट शौचालय) स्थापित किए थे। सिक्के से चलने वाले (कॉइन-ऑपरेटेड) इन ई-टॉयलेटों में स्मार्ट मीटर वाटर सप्लाई सिस्टम, सोक पिट, सेप्टिक टैंक, ऑटोमैटिक इलेक्ट्रॉनिक डोर सिस्टम, ऑटो फ्लशिंग, ऑटो क्लीनिंग तथा स्मार्ट इलेक्ट्रिकल और मोटराइज्ड उपकरण जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। लेकिन कुछ महीनों तक सुचारु रूप से चलने के बाद नियमित रखरखाव के अभाव, तकनीकी खराबियों और प्रशासनिक उदासीनता के कारण ये ई-टॉयलेट अब पूरी तरह बदहाल होकर कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। टूूूटे हुए नल, दीवारों में दरारें, पानी का अभाव, दुर्गंध, पान-थूक के दाग, वॉशबेसिन और कमोड में पड़े सिगरेट के टुकड़े तथा शराब की खाली बोतलें इस बात का संकेत देती हैं कि इन शौचालयों का इस्तेमाल नशाखोरों और असामाजिक तत्वों द्वारा भी किया जा रहा है। गंदगी से अटे पड़े इन स्मार्ट शौचालयों के नल, टंकियां और अन्य उपकरण चोरी हो चुके हैं, जबकि कई जगह इनके दरवाजे भी टूट चुके हैं।
नियमित सफाई तक नहीं
स्वच्छता को लेकर मनपा के अधिकारी कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शौचालयों के रखरखाव की बात तो दूर, उनकी नियमित सफाई तक नहीं कराई जाती। इतना ही नहीं, बिना किसी समुचित सर्वे के कई ई-टॉयलेट ऐसी जगहों पर बना दिए गए, जहां उनकी आवश्यकता ही नहीं थी।
